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confrence : स्वीट पेलोड बताएगा, किस देश में स्किन कैंसर का खतरा ज्यादा

Mon, 04 Dec 2023 01:25 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 04 Dec 2023 01:25 PM IST
सार

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में सोमवार से शुरू होने जा रही तीन दिवसीय कार्यशाला में शामिल होने आए अंतर विश्वविद्यालय केंद्र: खगोलविज्ञान और खगोलभौतिकी (आयुका) के वैज्ञानिक प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने संवाददाताओं से बातचीत में पलोड में लगे उपकरण और वैज्ञानिक उपयोगिता से जुड़ी विभिन्न जानकारियां साझा कीं।

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Sweet payload will tell in which country the risk of skin cancer is higher
प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी। वैज्ञानिक। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणों के गहन अध्ययन के लिए आदित्य एल-1 के साथ भेजा गया स्वीट पेलोड पर्यावरण और मेडिकल साइंस के क्षेत्र में कई अहम बदलाव लाने जा रहा है। इससे न सिर्फ सूर्य से जुड़े रहस्य उजागर होंगे, बल्कि यह भी पता चलेगा कि दुनिया में ऐसे कौन से देश हैं, जहां स्किन कैंसर का खतरा अधिक है और पर्यावरण पर सूर्य से आने वाले विकिरण एवं ग्रीन हाउस गैसों का कितना प्रभाव पड़ता है।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में सोमवार से शुरू होने जा रही तीन दिवसीय कार्यशाला में शामिल होने आए अंतर विश्वविद्यालय केंद्र: खगोलविज्ञान और खगोलभौतिकी (आयुका) के वैज्ञानिक प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने संवाददाताओं से बातचीत में पलोड में लगे उपकरण और वैज्ञानिक उपयोगिता से जुड़ी विभिन्न जानकारियां साझा कीं। आदित्य एल-1 मिशन पर लगे सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलिस्कोप (स्वीट) पेलोड को प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी के नेतृत्व में ही तैयार किया गया।
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सेटेलाइट में लगे कई उपकरण अलग-अलग प्रकार की तरंगों के आधार पर रिसर्च करेंगे। स्वीट पेलोड भी इन्हीं में से एक है। प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने बताया कि सूर्य से दो प्रकार की तरंगदैर्ध्य वाली किरणें निकलती हैं। छोटी किरणें वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाती है और ओजोन लेयर एवं ऑक्सीजन को प्रभावित करती हैं। बड़ी तरंगदैर्ध्य वाली किरणें पृथ्वी की सतह तक आती हैं, जो स्किन कैंसर का कारण बनती हैं। स्वीट पेलोड दोनों प्रकार की किरणों पर रिसर्च करेगा और इस रिसर्च के भविष्य में कई फायदे होंगे।

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हमें यह तो पता है कि सूर्य से आने वाला विकिरण एवं ग्रीन हाउस गैसें पर्यावरण को प्रभावित करती हैं, लेकिन स्वीट पेलोड से यह जानने में मदद मिलेगी कि पर्यावरण को प्रभावित करने में दोनों की कितनी हिस्सेदारी है। साथ ही यह भी पता चलेगा कि स्किन कैंसर का कारण बनने वाली बड़ी तरंगदैर्ध्य वाली किरणें पृथ्वी में कहां-कहां अधिक मात्रा में पहुंचती हैं और कहां कम मात्रा में हैं। मेडिकल साइंस के लिए यह जानकारी काफी अहम हो सकती है।

इसके साथ ही सेटेलाइट की बेहतर तरीके से मॉनीटरिंग हो सकेगी और सेटेलाइट टीवी, मोबाइल फोन से आने वाले रेडिएशन से पड़ने वाले प्रभाव का भी अध्ययन भी किया जा सकेगा। सूरज में अक्सर होने वाले विस्फोटों के बारे भी अनुमान लगाया जा सकेगा। प्रो. दुर्गेश के अनुसार दो हफ्ते पहले ही स्वीट पेलोड का आंतरिक स्विच ऑन किया गया है, जिससे पता चला है कि इसमें लगे सभी उपकरण काम कर रहे हैं। कुछ हफ्तों बाद इसे पूरी तरह से स्विच ऑन कर दिया जाएगा और पेलोड से महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने लगेंगी।

स्वीट पेलोड बनाने में लगे दस साल

प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने बताया कि इसरो ने वर्ष 2011 में देश भर के संस्थानों को प्रस्ताव भेजकर पूछा था कि वे आदित्य एल-1 मिशन पर किस तरह से भागीदारी करना चाहते हैं। आयुका ने भी स्वीट पेलोड का प्रस्ताव भेजा था। इसरो को तकरीबन 18 प्रस्ताव मिले थे, जिनमें से सात पेलोड को मंजूरी दी गई। स्वीट पेलोड भी इनमें से एक है। इसका निर्माण 2013 में शुरू हुआ था और 2023 में पूरा हुआ। इसे बनाने में दस साल का समय लगा।

आदित्य एल-1 पर कार्यशाला आज से

इविवि के भौतिक विज्ञान विभाग के शताब्दी वर्ष समारोह के तहत चार दिसंबर से से भौतिक विज्ञान विभाग के कमरा नंबर-18 में तीन दिवसीय कार्यशाला शुरू होने जा रही है, जिसका उद्घाटन कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव सोमवार को सुबह 10 बजे करेंगी। भौतिक विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. विवेक कुमार तिवारी के अनुसार इसमें बीएससी तृतीय वर्ष और एमएससी प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी शामिल होंगे। कुल 50 विद्यार्थियों में से 28 विद्यार्थी इविवि के हैं और बाकी 22 विद्यार्थी देश के अन्य शिक्षण संस्थानों से आएंगे।

प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी सहित आयुका के प्रो. निशांत सिंह, आईआईटी बीएचयू के प्रो. अभिषेक श्रीवास्तव, आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ आब्जरवेशनल साइंसेज नैनीताल के डॉ. वैभव पंत, सेंट्रल यूनिवर्सिटी राजस्थान के डॉ. राम किशोर, जय प्रकाश नारायण यूनिवर्सिटी छपरा के डॉ. आलोक रंजन तिवारी और इविवि के डॉ. उपेंद्र कुमार कुशवाहा आदित्य एल-1 मिशन के बारे में जानकारी देंगे।
 

गोरखपुर के प्रो. दुर्गेश ने यूपी का नाम किया रोशन

स्वीट पेलोड का निर्माण करके मूलत: गोरखपुर के रहने वाले प्रो. दुर्गेश त्रिपाठी ने देश में यूपी का नाम रोशन किया है। प्रो. दुर्गेश ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एमएससी करने के बाद लिंडाऊ जर्मनी से सोलर एनर्जी पर पीएचडी की और फिर कैंब्रिज ब्रिटेन से एप्लाइड मैथ्स एवं थिओरेटिकल फिजिक्स से पोस्ट डॉक्टोरल की उपाधि हासिल की। वर्ष 2011 में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में आयुका से जुड़े और अब वहां प्रोफेसर हैं।

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