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फैसला : 33 साल पहले हुई होटल कर्मी की हत्या की पत्रावली पेश नहीं कर पाई पुलिस, आरोपी बरी

Sun, 15 Oct 2023 05:11 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 15 Oct 2023 05:11 PM IST
सार

यह फैसला एमपी/एमएलए की विशेष अदालत के अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश चंद्र शुक्ला ने सुनाया। सिविल लाइंस थानाक्षेत्र में यह दिल दहला देेने वाली वारदात दो जुलाई 1990 को दिनदहाड़े हुई थी। करीब 11 बजे की बात है, यात्रिक होटल के कर्मचारी एसएच स्वामी बैंक में रुपये जमा करने निकले थे। लाल गिरजाघर के पास उनके ऊपर बम से हमला किया गया।

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Police could not present the file of murder of hotel worker 33 years ago, accused acquitted
कोर्ट - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

यात्रिक होटल के कर्मचारी की 33 साल पहले लूट और बम मारकर की गई हत्या के मामले की पत्रावली न थाने में मिली और न अभियोजन कार्यालय में। तीन दशक से ज्यादा चली सुनवाई के दौरान 10 में से दो गवाहों की मौत तक हो गई, जबकि सात लापता हो गए। मुल्जिम ने सफाई में कहा कि मुखबिरी न करने पर पुलिस ने फंसाया था। साक्ष्यों के अभाव में जिला एवं सत्र अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया।

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यह फैसला एमपी/एमएलए की विशेष अदालत के अपर सत्र न्यायाधीश दिनेश चंद्र शुक्ला ने सुनाया। सिविल लाइंस थानाक्षेत्र में यह दिल दहला देेने वाली वारदात दो जुलाई 1990 को दिनदहाड़े हुई थी। करीब 11 बजे की बात है, यात्रिक होटल के कर्मचारी एसएच स्वामी बैंक में रुपये जमा करने निकले थे। लाल गिरजाघर के पास उनके ऊपर बम से हमला किया गया। लुटेरे उनके पास से 20 हजार पांच सौ रुपए लूट ले गए। बम की चपेट में आए एसएच स्वामी की मौत हो गई।
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होटल की तत्कालीन प्रबंधक नीलम वर्मा ने अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या और लूट की एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने राजू उर्फ पप्पू, हुकुम पासी और लल्लू पासी को जेल भेज दिया। पुलिस ने वादी नीलम वर्मा समेत 10 लोगों को गवाह बनाकर आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इस दौरान हुकुम पासी की मौत हो गई। आरोपी राजू की पत्रावली पर अलग से हुई सुनवाई में उसे संदेह का लाभ देकर दो साल बाद ही बरी कर दिया गया।

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खुद को बेगुनाह साबित करने में लग गए 33 साल

लल्लू पासी को बेगुनाही साबित करने में 33 साल तक लग गए। इस दौरान अभियोजन की ओर से गवाह बनाए गए विवेचक वेदमूर्ति, डॉ. एमएस उपाध्याय, हैरिस आनंद हर्षा, बदलू स्वीपर, मुन्ना लाल वाल्मीकि और विनोद जायसवाल दस्तावेजों में दर्ज पते से लापता पाए गए। पुलिस अपने ही विवेचक को पेश नहीं कर पाई। जगमोहन जैसवार और रफीक बच्चन की मौत हो जाने से उनकी भी गवाही नहीं हो पाई।

हाईकोर्ट के प्राचीनतम वादों के निस्तारण के क्रम में लल्लू पासी के मामले की सत्र न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई। पता चला कि आरोपी राजू की दोषमुक्ति के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से दाखिल अपील में हाईकोर्ट ने पत्रावली तलब कर रखी है। पत्राचार के बाद हाईकोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार (क्रिमिनल अपील) ने उपलब्ध दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि सत्र न्यायालय को भेजी। इसमें आरोप पत्र समेत कई अभिलेख नहीं होने की सूचना जिला न्यायाधीश को दी गई।

अदालत को न आरोप पत्र मिला न ही डायरी

काफी तलाश के बाद अदालत को न आरोप पत्र मिला, न ही केस डायरी। अंतत: हाईकोर्ट से मिली प्रमाणित प्रतिलिपि के आधार पर सुनवाई शुरू हुई। इकलौती गवाह नीलम वर्मा ने बताया कि एफआईआर उन्होंने लिखाई थी, लेकिन वह थाने नहीं गईं। उन्होंने राजू के मामले में भी गवाही दी थी, लेकिन पुलिस ने उनका बयान लिया था कि नहीं, यह याद नहीं। वह हत्यारोपियों को भी जानती पहचानती नहीं। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में लल्लू को बरी कर दिया।

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