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हाईकोर्ट ने कहा : नियमितीकरण के लाभ से किसी को नहीं कर सकते वंचित

Sat, 05 Feb 2022 01:56 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 05 Feb 2022 01:56 AM IST
सार

संशोधित कानून से पहले दिए गए अदालती फैसले के आधार पर लाभ देना सही नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ललितपुर से सेवानिवृत्त हुए कनिष्ठ अभियंता को सेवानिवृत्ति परिलाभों सहित पेंशन भुगतान पर दो माह में निर्णय लेने का दिया आदेश।
 

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High Court said: No one can be deprived of the benefit of regularization
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कानून संशोधित होने से पहले दिए गए अदालती फैसले के आधार पर लाभ नहीं दिया जा सकता। भूतलक्षी प्रभाव वाले कानून संशोधन को चुनौती दिए बगैर उसके उपबंधों की अनदेखी नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि खाली पद पर नियमानुसार कानून के तहत की गई नियुक्ति ही मान्य है।

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कोर्ट ने कहा कि समय से नियमित न करना वरिष्ठता व अन्य सेवा परिलाभों से वंचित करना है। सरकार पिक एंड चूज नहीं कर सकती। सेवा नियमितीकरण नियमावली के लाभ से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने लघु सिंचाई विभाग के चीफ  इंजीनियर को ललितपुर से सेवानिवृत्त कनिष्ठ अभियंता राज बहादुर को सेवानिवृत्ति परिलाभों सहित पेंशन भुगतान पर दो माह में निर्णय लेने और उसके छह हफ्ते में सेवा जनित परिलाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र तथा न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए दिया है। अपील पर राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय ने बहस की। कोर्ट ने सरकार को विचार कर निर्णय लेने का आदेश दिया।

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याची को नियमित करने का दिया आदेश
याची की नियुक्ति सिंचाई विभाग में कनिष्ठ अभियंता के रूप में एक जनवरी 1989 को की गई। वह दैनिक वेतन पर वर्षों तक कार्यरत रहा। 21 फरवरी 97 को कोर्ट ने न्यूनतम वेतन भुगतान पर सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया। इसके पालन में चीफ  इंजीनियर ने तीन सितंबर 97 को न्यूनतम वेतन भुगतान का आदेश दिया किंतु सेवा नियमित करने से इंकार कर दिया। जिसे सेवा अधिकरण में चुनौती दी गई।



कहा कि सेवा नियमितीकरण नियमावली लागू होने से पहले से वह कार्यरत है। नियमावली के तहत वह नियमित किए जाने का हकदार है। अधिकरण ने दावा स्वीकार कर लिया और याची को नियमित करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ  याचिका पर कोर्ट ने नियमावली 2001 के तहत सरकार को विचार कर निर्णय लेने का आदेश दिया। 31 दिसंबर 18 को याची को नियमित कर दिया गया।



इसके बाद 30 सितंबर 20 को वह सेवानिवृत्त हो गया। उसकी दस साल की सेवा न पूरी होने के कारण जब पेंशन देने से इंकार कर दिया गया तो उसने याचिका दायर की। मामले में एकलपीठ ने प्रेम सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत पेंशन आदि सेवानिवृत्ति परिलाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया। इस आदेश को अपील में चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने सेवा नियमित करने में देरी के लिए कर्मचारी दोषी नहीं 
सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे अपर मुख्य अस्थायी अधिवक्ता ने कहा कि 2021 में कानून संशोधित कर दिया गया। 1961 से लागू किया गया है। जिसके तहत नियमित रूप से नियुक्ति मामले को ही सेवा अवधि में शामिल किया जाएगा। याची का पद लोक सेवा आयोग की परिधि में आने वाला पद है। क्योंकि, याची की नियुक्ति नियमानुसार खाली पद पर नहीं की गई थी, इसलिए उसकी दैनिक सेवाएं नहीं जोड़ी जाएंगी। प्रेम सिंह केस इस मामले में लागू नहीं होगा।



यह वर्क चार्ज कर्मचारियों के विषय में है। एकल पीठ ने 2020 में जारी अध्यादेश व 2021 में कानून संशोधन के उपबंधों पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति व्यक्त की और कहा एकल पीठ ने गलती की है।



सेवा नियमित करने के आदेश को चुनौती दिए बगैर सेवा नियमितीकरण नियमावली का लाभ देने से इंकार करने के तर्क को सही नहीं माना जा सकता है और कहा कि सेवा नियमित करने में देरी के लिए कर्मचारी को दोषी नहीं मान सकते। नियमावली के तहत नियमितीकरण उपबंधों का लाभ देते हुए परिलाभों का भुगतान किया जाए।

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