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उचित नहीं सनातन धर्म को बांटना
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 09 Feb 2016 12:19 AM IST
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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की ओर से अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) पर धर्मांतरण के आरोप को लेकर देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई है। दुनिया भर में कृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार करने वाले इस्कॉन पर कृष्ण भक्ति की आड़ में देश का पैसा विदेशों में भेजने और झारखंड, छत्तीसगढ़, असम सहित पूर्वोंत्तर के राज्यों से इस्कॉन के पांव खींचने के आरोप को भी संतों, धर्माचार्यों ने सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि पहले साईं को मुसलमान बताकर, फिर शनि पूजा को महिलाओं के लिए अमंगलकारी तथा शनि को क्रूर देव नहीं ग्रह कहने वाले शंकराचार्य की ओर से अब इस्कॉन पर कीचड़ फेंकने का मामला महज शिगूफा से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का कहना है कि इस्कॉन के बारे में टिप्पणी करना धर्म विरोधी है। प्रभुपाद जी ने हरेकृष्ण संकीर्तन को बढ़ावा देकर सनातन धर्म को ही मजबूत किया है। धर्म को व्यापार नहीं बनाना चाहिए लेकिन धर्म का प्रचार-प्रसार भी नहीं रुकना चाहिए। काशी सुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि अगर ऐसा है तो निश्चित रूप से अनुचित है लेकिन इस्कॉन की ओर से धर्मांतरण की बातें अब तक सुनने में नहीं आई हैं। किसी भी धर्मगुरु को विवादों से बचना चाहिए। यदि धर्मांतरण हुआ है तो यह भी बताना होगा कि कब, कहां और कितने हिन्दू ईसाई हुए। प्रभुपाद ने तो विदेशियों को कृष्ण भक्ति में दीक्षित करके सनातन धर्म से जोड़ा है।
स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ ने कहा, शंकराचार्य जी को ऐसे विवादों से बचना चाहिए। उनका बयान धर्म और कानून दोनों से परे है। इस्कॉन एक रिकगनाइज्ड और रजिस्टर्ड संस्था है। प्रभुपाद जी पहले ऐसे महात्मा थे, जो अपना घर-बार त्याग करकेकृष्ण भक्ति के प्रचार के लिए पूरी दुनिया में घूमे। कृष्ण तो हमारे हैं, ऐसे में जहां जहां इस्कॉन है, वहां-वहां कृष्ण भक्ति के बहाने भारत के ज्ञान की पताका फहरा रही है। जहां तक पूर्वोत्तर के राज्यों का सवाल है, मणिपुर और गुवाहाटी में इस्कॉन के भव्य मंदिर हैं। हेराफेरी पर नजर के लिए सरकार के अन्य विभाग हैं।
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कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने पहले साईं, फिर शनि और अब पूरी दुनिया में कृष्ण भक्ति का प्रचार करने वाले इस्कॉन पर ऊंगली उठाकर सनातन धर्म का ही अहित किया है। उनका बयान यथार्थ से परे है। वैसे भी हिन्दू धर्म, जातियों के आधार पर विभाजित है।
ऐसे में शंकराचार्य, रामानंदाचार्य, रामानुजाचार्य किसी को भी ऐसा कोई बयान नहीं देना चाहिए, जिससे इस धर्म केऔर टुकड़े हो जाएं। शंकराचार्य का बयान हिन्दुओं को विभाजित करने वाला है क्योंकि साईं, शनि और कृष्ण तीनों को मानने वाले हिन्दू ही हैं। वहीं परी अखाड़े की प्रमुख त्रिकाल भवंता ने इस मामले पर हैरानगी जताई है। कहा, शंकराचार्य को ऐसी टिप्पणियां शोभा नहीं देती हैं। समाज को उनके धार्मिक चिंतन की आवश्यकता है, विवादित बयान की नहीं। उनके बयान से तो हिन्दू समाज और बंटेगा।
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स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का कहना है कि इस्कॉन के बारे में टिप्पणी करना धर्म विरोधी है। प्रभुपाद जी ने हरेकृष्ण संकीर्तन को बढ़ावा देकर सनातन धर्म को ही मजबूत किया है। धर्म को व्यापार नहीं बनाना चाहिए लेकिन धर्म का प्रचार-प्रसार भी नहीं रुकना चाहिए। काशी सुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि अगर ऐसा है तो निश्चित रूप से अनुचित है लेकिन इस्कॉन की ओर से धर्मांतरण की बातें अब तक सुनने में नहीं आई हैं। किसी भी धर्मगुरु को विवादों से बचना चाहिए। यदि धर्मांतरण हुआ है तो यह भी बताना होगा कि कब, कहां और कितने हिन्दू ईसाई हुए। प्रभुपाद ने तो विदेशियों को कृष्ण भक्ति में दीक्षित करके सनातन धर्म से जोड़ा है।
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स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ ने कहा, शंकराचार्य जी को ऐसे विवादों से बचना चाहिए। उनका बयान धर्म और कानून दोनों से परे है। इस्कॉन एक रिकगनाइज्ड और रजिस्टर्ड संस्था है। प्रभुपाद जी पहले ऐसे महात्मा थे, जो अपना घर-बार त्याग करकेकृष्ण भक्ति के प्रचार के लिए पूरी दुनिया में घूमे। कृष्ण तो हमारे हैं, ऐसे में जहां जहां इस्कॉन है, वहां-वहां कृष्ण भक्ति के बहाने भारत के ज्ञान की पताका फहरा रही है। जहां तक पूर्वोत्तर के राज्यों का सवाल है, मणिपुर और गुवाहाटी में इस्कॉन के भव्य मंदिर हैं। हेराफेरी पर नजर के लिए सरकार के अन्य विभाग हैं।
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कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने पहले साईं, फिर शनि और अब पूरी दुनिया में कृष्ण भक्ति का प्रचार करने वाले इस्कॉन पर ऊंगली उठाकर सनातन धर्म का ही अहित किया है। उनका बयान यथार्थ से परे है। वैसे भी हिन्दू धर्म, जातियों के आधार पर विभाजित है।
ऐसे में शंकराचार्य, रामानंदाचार्य, रामानुजाचार्य किसी को भी ऐसा कोई बयान नहीं देना चाहिए, जिससे इस धर्म केऔर टुकड़े हो जाएं। शंकराचार्य का बयान हिन्दुओं को विभाजित करने वाला है क्योंकि साईं, शनि और कृष्ण तीनों को मानने वाले हिन्दू ही हैं। वहीं परी अखाड़े की प्रमुख त्रिकाल भवंता ने इस मामले पर हैरानगी जताई है। कहा, शंकराचार्य को ऐसी टिप्पणियां शोभा नहीं देती हैं। समाज को उनके धार्मिक चिंतन की आवश्यकता है, विवादित बयान की नहीं। उनके बयान से तो हिन्दू समाज और बंटेगा।