गुमनाम गलियां : दूसरी संधि के बाद अंग्रेजों ने दिया था चड्ढा गली का नाम, मुगलकाल की गाथाओं की है साक्षी
शहर कोतवाली के बगल से पुराने शहर को जोड़ने वाली चड्ढा जी की गली मुगलकाल के अंत की गाथाओं को समेटे हुए है। यह गली अवध के नवाब शुजाउद्दौला और लाॅर्ड रावर्ट क्लाइव के बीच हुई इलाहाबाद की द्वितीय संधि से जुड़ी है।
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संगम के शहर की कुछ गलियों की अपनी खूबियां भी हैं और पहचान भी। लेकिन, कई ऐसी गुमनाम गलियां भी हैं जिनके बारे में या तो लोग भूल चुके हैं या नई पीढ़ी के लोग उनका गौरवशाली अतीत जानते तक नहीं। ऐसी ही गुमनाम गलियों में से एक है पुराने शहर की चड्ढा जी की गली, जिसका नामकरण कभी ब्रिटिश सरकार ने किया था।
शहर कोतवाली के बगल से पुराने शहर को जोड़ने वाली चड्ढा जी की गली मुगलकाल के अंत की गाथाओं को समेटे हुए है। यह गली अवध के नवाब शुजाउद्दौला और लाॅर्ड रावर्ट क्लाइव के बीच हुई इलाहाबाद की द्वितीय संधि से जुड़ी है। 1765 में दूसरी बार बंगाल के गवर्नर के रूप में नियुक्त हुए लाॅर्ड रावर्ट क्लाइव ने जब पूर्वी प्रांतों से कर वसूली के लिए दबाव बनाया और सेना लेकर लेकर अवध प्रांत पर चढ़ाई की तब शुदाउद्दौला के सरदार रहे राय जगत नारायण चड्ढा ने ब्रिटिश सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया था।
उनके साहस और पराक्रम से नवाब शुजाउद्दौला बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन 16 अगस्त 1765 को क्लाइव के दबाव के आगे शुजाउद्दौला को इलाहाबाद की दूसरी संधि करनी पड़ी थी। अवध प्रांत के इतिहास पर काम करने वाले डॉ. संतोष खन्ना तोसी बताते हैं कि तब इस संधि के तहत इलाहाबाद और कड़ा को छोड़कर अवध का शेष क्षेत्र नजमुद्दौला को वापस करने पर सहमति बनी। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से अवध प्रांत की सुरक्षा के लिए नवाब के खर्च पर एक अंग्रेजी सेना रखी गई।
ईस्ट इंडिया कंपनी मिला था मुफ्त व्यापार का अधिकार
संधि के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी को अवध में कर मुफ्त व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हो गया था। इसके बाद अंग्रेजों ने राय साहब की उपाधि से विभूषित जगत नारायण चड्ढा के नाम पर पुराने शहर के मुख्य मार्ग का नामकरण कर दिया। जगत नारायण चड्ढा की कोठी तब सौ एकड़ क्षेत्रफल में थी।
डॉ. संतोष खन्ना तोसी बताते हैं कि मौजूदा गोल पार्क से लेकर अतरसुइया में कल्याणी देवी मंदिर के आगे खत्री पाठशाला तक जगदीश बाग और भगवत बाग उन्हीं के बसाए हुए थे। इसी क्षेत्र में तब पंजाब से आए खत्रियों के सैनिक परिवार बस गए। अब चड्ढा जी की कोठी वाले इलाके में पांच सौ से अधिक परिवारों के घर आबाद हैं।
पुरानी गलियों और मोहल्लों पर अध्ययन करने वाले कुंवर जी टंडन बताते हैं कि जगतनारायण चड्ढा के पुत्र धनवंत नारायण चड्ढा भी शहर में खूब लोकप्रिय हुए थे। वह बताते हैं कि इलाहाबाद की दूसरी संधि के बाद ही अंग्रेजों ने अतरसुइया जाने वाली गली के प्रवेश द्वार पर चड्ढा जी की गली वाला पत्थर लगाया गया था।