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प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में सही तरीके से लागू हो पाठ्यक्रम
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उप्र के उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा के पाठ्यक्रम को सही तरीके से लागू करने के लिए उप्र सरकार द्वारा गठित समिति के पास औटा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रक्षपाल सिंह ने अपने सुझाव प्रेषित किए हैं। उनका कहना है कि अगर सही से पाठ्यक्रम लागू होगा तो युवाओं का भविष्य भी बेहतर होगा।
विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के लिए शिक्षा सत्र 2021-22 से एक समान पाठ्यक्रमों के निर्धारण के लिए चार विवि के कुलपतियों की गठित समिति को ईमेल कर डॉ. रक्षपाल सिंह ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अतीत में शिक्षा सत्र में 180 कार्य दिवस का पठन-पाठन मानकर विभिन्न विषयों की कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम तैयार होते रहे हैं। हकीकत यह है कि कई वर्षों से 140 कार्य दिवस से कम ही पठन-पाठन हो सका है। ऐसे में पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता है। कहा कि कार्य दिवसों की संख्या 150 से 160 मानकर पाठ्यक्रम निर्धारित किए जाने चाहिये। शिक्षण संस्थानों में मानकों के अनुरूप शिक्षकों की नियुक्ति होनी चाहिए।
कहा कि विभिन्न विषयों के थ्योरी व प्रेक्टिकल पाठ्यक्रमों के प्रति गंभीरता के मद्देनजर विद्यार्थियों की उपस्थिति कम से कम 75 प्रतिशत की जानी चाहिए। संस्थानों की सतत निगरानी होनी चाहिए। अधिकांश स्ववित्त पोषित एवं सरकारी महाविद्यालयों में कुछ वर्षों से प्रयोगात्मक परीक्षाओं के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। प्रयोगात्मक कार्य को गंभीरता प्रदान करने के लिए प्रयोगात्मक पाठयक्रम की लिखित परीक्षा का एक पेपर बढ़ाया जाना चाहिए। प्रयोगात्मक व मौखिक परीक्षा का रिकॉर्ड होना चाहिए। वाह्य व आंतरिक परीक्षकों द्वारा मूल्यांकन करने के बाद सभी संदर्भित कागजात तत्काल विश्विद्यालय में जमा होने चाहिए। उन्होंने कहा कि फर्जीवाड़े पर अंकुश लगेगा, तभी पाठ्यक्रम निर्धारण सार्थक होगा।
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विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के लिए शिक्षा सत्र 2021-22 से एक समान पाठ्यक्रमों के निर्धारण के लिए चार विवि के कुलपतियों की गठित समिति को ईमेल कर डॉ. रक्षपाल सिंह ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए अतीत में शिक्षा सत्र में 180 कार्य दिवस का पठन-पाठन मानकर विभिन्न विषयों की कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम तैयार होते रहे हैं। हकीकत यह है कि कई वर्षों से 140 कार्य दिवस से कम ही पठन-पाठन हो सका है। ऐसे में पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता है। कहा कि कार्य दिवसों की संख्या 150 से 160 मानकर पाठ्यक्रम निर्धारित किए जाने चाहिये। शिक्षण संस्थानों में मानकों के अनुरूप शिक्षकों की नियुक्ति होनी चाहिए।
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कहा कि विभिन्न विषयों के थ्योरी व प्रेक्टिकल पाठ्यक्रमों के प्रति गंभीरता के मद्देनजर विद्यार्थियों की उपस्थिति कम से कम 75 प्रतिशत की जानी चाहिए। संस्थानों की सतत निगरानी होनी चाहिए। अधिकांश स्ववित्त पोषित एवं सरकारी महाविद्यालयों में कुछ वर्षों से प्रयोगात्मक परीक्षाओं के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। प्रयोगात्मक कार्य को गंभीरता प्रदान करने के लिए प्रयोगात्मक पाठयक्रम की लिखित परीक्षा का एक पेपर बढ़ाया जाना चाहिए। प्रयोगात्मक व मौखिक परीक्षा का रिकॉर्ड होना चाहिए। वाह्य व आंतरिक परीक्षकों द्वारा मूल्यांकन करने के बाद सभी संदर्भित कागजात तत्काल विश्विद्यालय में जमा होने चाहिए। उन्होंने कहा कि फर्जीवाड़े पर अंकुश लगेगा, तभी पाठ्यक्रम निर्धारण सार्थक होगा।
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