Aligarh: पशुओं में लंपी स्किन डिजीज रोग फैला, लखनऊ से पहुंचे पशुपालन विभाग के निदेशक ने जाना हाल
रविवार को लखनऊ से पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. पीके सिंह ने दोनों ही ब्लॉकों के पीड़ित गांवों के पशुओं का हाल-चाल जानने के साथ ही पशुपालकों से इसकी जानकारी ली है। उन्होंने बताया कि पशुओं को इस रोग से बचाने के लिए जल्द ही वैक्सीन मंगाई जा रही है।
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जिले के टप्पल एवं चंडौस ब्लॉक के करीब 10-15 गांवों में इन दिनों पशुओं पर लंपी स्किन डिसीज (LSD) का खासा प्रकोप देखने को मिल रहा है। इसको लेकर पशुपालन विभाग में खलबली मच गई है।
रविवार को लखनऊ से पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. पीके सिंह ने दोनों ही ब्लॉकों के पीड़ित गांवों के पशुओं का हाल-चाल जानने के साथ ही पशुपालकों से इसकी जानकारी ली है। उन्होंने बताया कि पशुओं को इस रोग से बचाने के लिए जल्द ही वैक्सीन मंगाई जा रही है। अभी तक लंपी वायरस का प्रकोप राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों में देखने को मिल रहा था। अब यह बीमारी राजस्थान के रास्ते अलीगढ़ भी आ पहुंची है।
उन्होंने बताया कि इससे अब तक करीब 300 पशु संक्रमित हो चुके हैं। खासकर गोवंश इससे अधिक पीड़ित हो रहे हैं। खैर ब्लॉक के खेड़ा दयालनगर, मोहसिनपुर, नारायणपुर, सिद्धगढ़ी, गौमत, सोफा, सोफा नगरिया, निबसानी, साथना, श्यामराज, बहरौला, कुरावन आदि के अलावा चंडौस ब्लॉक के पिसावा क्षेत्र में बड़ी संख्या में पशु बीमारी की चपेट में आ रहे हैं।
सबसे पहले दूध देने वाली गायों को निशाना बनाता है लंपी वायरस
पशुपालन विभाग की टीमें लगातार इन गांवों में सक्रिय हैं और बीमार पशुओं का उपचार कर रही हैं। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. बीपी सिंह के अनुसार यह बीमारी गायों की सभी प्रजातियों में होती हैं। दूध देने वाली गायों की इम्यूनिटी थोड़ी कम होती है, इसलिए लंपी वायरस सबसे पहले दूध देने वाली गायों को अपना शिकार बनाती है। छोटे बछड़ों पर यह कहीं घातक होती है।
उन्होंने बताया कि जर्सी नस्ल की गाय में यह बीमारी जानलेवा होती है। भारतीय प्रजाति की जेबू कैटल गायों में यह जानलेवा नहीं होती। उन्होंने बताया कि यह बीमारी हवा में नहीं फैलती है। छींकने, थूक या लार और साथ में चारा खाने एवं पानी पीने से यह बीमारी नहीं होती है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी गायों का खून चूसने वाले कीड़ों और मक्खी, मच्छरों के जरिए फैलती है। एक गाय के खून से दूसरे गाय के खून में फैलती है। इसलिए इंजेक्शन की सुई को दूसरी गाय के उपयोग में नहीं लाएं।