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कारगिल युद्ध : आंखों के सामने साथियों ने तोड़ा दम, दहल गया दिल

Sun, 26 Jul 2020 02:06 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 26 Jul 2020 02:06 AM IST
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Kargil war: the companions broke before the eyes, the heart was shaken
हवलदार मुश्ताक अली। - फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस
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गोलियों की तड़तड़ाहट। जगह-जगह उठता धुआं। आंखों के सामने अपने साथियों के दम तोड़ने का मंजर आज भी याद है। यह मंजर दिलो-दिमाग में इस कदर बैठा है कि फौजियों का केवल जिक्र होते ही अपनों के खोने का दर्द आंखों से आंसू बहकर निकलने लगता है। दिल को दहला देने वाले मंजर के गवाह हैं जमालपुर के मौलाना आजाद नगर निवासी हवलदार मुश्ताक अली। वह बताते हैं कि जवानों ने गोलियों की परवाह किए बगैर पाकिस्तानी फौजियों का डटकर मुकाबला किया और शहीद हो गए। जवानों में जो बेताबी कारगिल पहाड़ी पर कब्जा कर उस पर तिरंगा फहराने की देखी। वैसी बेताबी हमने कहीं नहीं देखी।
मौत बनकर ऊपर से गिर रहे थे बम
हवलदार मुश्ताक अली ने बताया कि वर्ष 1999 में कारगिल लड़ाई जब छिड़ी तो उस समय उनकी तैनाती उड़ी सेक्टर में थी, जो कारगिल पहाड़ी से 10 किलोमीटर बाएं है। कारगिल की पहाड़ी करीब 15-18 किलोमीटर दायरे में फैली है। दिन-रात गोलाबारी होती रहती थी। ऐसे हालात पैदा हो गए कि मानो मोर्टार नहीं, बल्कि मौत बरस रही हो। जो जवान आम दिनों में दो घंटे की ड्यूटी और चार घंटे आराम करता था, लेकिन कारगिल में यही जवान 12-12 घंटे की ड्यूटी करते थे। आंखों से नींद गायब हो चुकी थी। केवल एक-डेढ़ घंटे ही सो पाते थे। हर तरफ मौत मंडराती रही। बकौल मुश्ताक, मेरी आंखों के सामने राजपूत रेजीमेंट के तीन जवान शहीद हो गए। ऐसा मंजर देखकर मेरा दिल दहल गया। इसके बावजूद लड़ाई के दौरान ऐसा जज्बा पैदा हो गया कि बस दुश्मनों को मार गिराना है।
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ग्रेनेड की आवाज से चली गई सुनने की ताकत
मराठा एलआईएफ में हवलदार मुश्ताक अली बताते हैं कि कारगिल में हार के बावजूद पाकिस्तान लगातार गोलाबारी करता रहा। दुश्मनों ने घुसपैठ की भी नापाक कोशिश की। मगर, देश के वीर सपूतों ने उनकी मंसूबों पर पानी फेर दिया। बकौल मुश्ताक अली, ऑपरेशन रक्षक के तहत मेरी तैनाती उड़ी सेक्टर में थी, जो कारगिल से 10 किलोमीटर बायें दिशा में है। फरवरी 2001 में साथियों के साथ गश्त पर था। इसी बीच दुश्मनों ने ग्रेनेड से हमला कर दिया। इसमें दक्षिण भारत के रहने जवान शेख नायब रसूल व एसएम बादशाह शहीद हो गए, दोनों ममेरे भाई थे। इसके बाद प्रताप पाटिल भी शहीद हो गए। एक-एक साथियों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देख मेरा दिल बैठा जा रहा था, तभी मैंने खुद को देखा तो पेट के नीचे के हिस्से का कपड़ा गायब हो चुका था। बाएं पंजे की तर्जनी गायब थी। कान से कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। आज भी बायें कान से सुनाई नहीं देता है। दायें कान से भी कम सुनाई देता है। दायां पैर मांस के लोथड़े में बदल चुका था। राइफल गायब थी। मैगजीन का अता-पता नहीं था। यह सब देख बेहोश हो गया। मुझे और मेरे साथियों को सेना के अस्पताल लाया गया, जहां मेरे और साथी शहीद हो गए। 36 दिनों तक मैं कोमा में रहा। डेढ़ महीने बाद घर पर तार के जरिये मेरी तबीयत के बारे में जानकारी दी गई। दायें पैर में दो किलो 600 ग्राम की रॉड पड़ी है। छह महीने बाद हवाई जहाज से मुझे दिल्ली लगाया। फिर कार से घर लौटा। डेढ़ साल स्टिक के सहारे चलना शुरू किया।
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पिता के नक्शेकदम पर चले बेटे
जमालपुर के मौलाना आजाद नगर निवासी हवलदार मुश्ताक अली (52) ने बताया कि वह सेना में 1987 में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे। वर्ष 2011 में हवलदार पद से रिटायर हो गए। मुश्ताक अली ने कहा कि उनके दो बेटे फौज में हैं। उन्होंने बताया कि बड़ा बेटा शहबाज खान राजपूत रेजीमेंट में हैं, जबकि सरताज अली एयरफोर्स में है। सबसे छोटा बेटा आईएएस की तैयारी कर रहा है। मुश्ताक अली ने कहा कि बेटों को बेहतर परवरिश में मेरी पत्नी सलीमन बेगम की अहम भूमिका है।
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