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हिंदी हैं हमः सामाजिक बदलाव में सहायक हैं हिंदी में हो रहे शोध

Fri, 17 Sep 2021 09:02 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 17 Sep 2021 09:02 PM IST
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Hindi Hain Hum
हिंदी हैं हम के तहत आयोजित कार्यक्रम में मौजूद शोधार्थी नवीन सिंह, सोनपाल सिंह। - फोटो : CITY OFFICE
हिंदी में होने वाले शोध सामाजिक बदलाव में सहायक होते हैं और सामाजिक आंदोलनों को गति प्रदान करते हैं। यह मानना है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में हिंदी विभाग के शोधार्थियों का। हिंदी में शोध से जुड़ी अनेक समस्याओं पर भी इन छात्रों ने खुलकर अपने विचार व्यक्त किए। इनका कहना है कि शोध कार्य के लिए प्रवेश देने से लेकर नौकरी मिलने तक पूरी तरह पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। रोजगार की सुनिश्चितता शोध कार्य को उत्कृष्ट बनाएगी। शुक्रवार को ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत तालानगरी स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित परिचर्चा में शोधार्थियों ने कहा कि शोध की प्रवेश प्रक्रिया से लेकर बाद में नौकरी मिलने तक की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
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शोधार्थियों का कहना है कि आर्थिक संकट भी शोध के स्तर को काफी प्रभावित करता है। नॉन एड फेलोशिप में सिर्फ आठ हजार रुपये मिलते हैं। इससे नई किताबें खरीदने, किसी से साक्षात्कार, रहने-खाने में दिक्कत होती है। शोध सामग्री में यदि किसी भी प्रकार की चोरी की गई है तो शोध गंगा के जरिये उसे केवल यूनिकोड में ही पकड़ा जा सकता है, अन्य फांट में यह सुविधा नहीं है। इसके अलावा यूजीसी द्वारा अनुमन्य पत्रिकाओं में छपे लेखों को शोध माना जाता है। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ये पत्रिकाएं उसी विषय पर लेख छापती हैं, जिनको वे चुनती हैं। इन छात्रों का यह भी कहना है कि शोध को लेकर सुविधाएं बढ़ाई जानी चाहिए। नेशनल लाइब्रेरी में जाने पर वहां ऑफलाइन फार्म भरने की औपचारिकता करनी पड़ती है। इस पर गारंटर के हस्ताक्षर करवाने पड़ते हैं। यदि यह फार्म ऑनलाइन मिलने लगे तो छात्र उस पर अपने किसी प्रोफेसर आदि के हस्ताक्षर करवा कर ले जा सकता है। हिंदी शोध में एक समस्या यह भी है कि कई बार शोधार्थी को अपनी रुचि के बजाय गाइड की विचारधारा को देखते हुए विषय का चुनाव करना पड़ता है।
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प्रवेश परीक्षा में विश्लेषणात्मक क्षमता को भी परखा जाना चाहिए
शोध की प्रवेश प्रक्रिया में जो पैटर्न रखा गया है, उसमें ज्यादातर बहुविकल्पीय प्रश्न शामिल किए गए हैं। सच्चाई यह है कि शोध बहुविकल्पीय आधारित विषय नहीं है। इसलिए विश्लेषणात्मक क्षमता को भी परखा जाना चाहिए। कई विश्वविद्यालयों में साक्षात्कार के आधार पर शोध में प्रवेश दिए जा रहे हैं, जिसमें भाई-भतीजावाद का दखल बढ़ जाता है। ऐसे में योग्य विद्यार्थी प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। इससे उत्कृष्ट शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। नॉन एड फेलोशिप कम होने से शोधार्थी जूनियर रिसर्च फेलोशिप की परीक्षा देता रहता है, जिससे काफी समय निकल जाता है।
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- नवीन कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग एएमयू।
विचारों पर न लगे प्रतिबंध
शोध के दौरान शोधार्थी से इच्छा व रुचि पूछी जानी चाहिए, लेकिन दोनों उससे नहीं पूछी जाती। अक्सर शोध सामग्री की सहज उपलब्धता को देखते हुए गाइड अपने हिसाब से शोधार्थी से विषय का चयन करवाते हैं। वैचारिक खेमेबंदी का असर भी शोध पर पड़ता है। साहित्य दो खेमों में बंट गया है। हिंदी में शुक्ल युग व द्विवेदी युग को लेकर राइट व लेफ्ट विंग बन गए हैं, जिसका खामियाजा शोधार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। नए विचारों पर जैसे प्रतिबंध लग गया है। शोधार्थी अपने विचार नहीं लिख सकते क्योंकि यूजीसी द्वारा अनुमन्य पत्रिकाओं के हिसाब से लिखेंगे तो ही लेख छप पाएगा। बहुअनुशासनात्मक विषयों पर भी हिंदी में शोध होना चाहिए।
-सोनपाल सिंह, शोधार्थी, हिंदी विभाग, एएमयू
लोक साहित्य में भी होना चाहिए शोध
लोक भाषा या लोक साहित्य की हिंदी में शोध की स्थिति क्या है, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। किसी रचनाकार या साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध कार्य करने के लिए शोधार्थी को कह दिया जाता है, जो परिपाटी चली आ रही है। शोध कार्य के लिए विभाग व गाइड की उदासीनता भी है। शोधार्थी की सामग्री चेक भी नहीं हो पाती है। उसने सामग्री से कहां से जुटाई है, इसकी भी पड़ताल नहीं होती। जब सामग्री जुटाकर गाइड के पास शोधार्थी लाता है, तो उनके पास उसे चेक करने का कोई साधन नहीं होता है। गाइड उस पर हस्ताक्षर करके उसे सब कुछ अच्छा बता देता है। लोक साहित्य में बहुत पहले लिखा-पढ़ा जा चुका है, उस पर बात करनी जरूरी है।

-रामलखन कुमार, शोधार्थी, हिंदी विभाग, एएमयू
बोलियों का न जानना भी दिक्कत
हिंदी की बोलियों का सम्यक ज्ञान न होना भी शोध के लिए बड़ी दिक्कत है। मान लीजिए, किसी शोधार्थी को सूरदास के काव्य पर शोध करना है, लेकिन गाइड को ब्रज भाषा नहीं आती है। ऐसे में मापदंड क्या होगा कि गाइड ने शोधग्रंथ को सही-सही चेक किया होगा। छह महीने में हिंदी के शोधार्थी से प्रगति का ब्यौरा लिया जाता है, लेकिन कागजों पर, जबकि इतिहास विभाग के शोधार्थी को छह महीने में किए गए कार्य को लेकर सुपरवाइजर व पैनल के समक्ष प्रेजेंटेशन देना होता है। प्रेजेंटेशन के दौरान शोधार्थी बता देगा कि वह कहां-कहां गया और किससे मिला। यदि शोध में कोई कमी रहती है तो वरिष्ठ लोग बताएंगे फलां जगह चले जाना और फलां लोगों से मिल लेना, लेकिन हिंदी के मामले में ऐसा नहीं है।
-सुनील चौधरी, शोधार्थी, हिंदी विभाग, एएमयू
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