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विवेचना में खेल...हत्या में नहीं आई चार्जशीट, मिली जमानत

Sun, 07 Mar 2021 07:10 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 07 Mar 2021 07:10 PM IST
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एडवोकेट मुकेश कुमार अत्री। - फोटो : CITY OFFICE
अभिषेक शर्मा
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यह जानबूझकर किया गया या फिर अंजाने में हुआ? मगर, हत्या के संगीन अपराध में दो नामजदों के जेल जाने के 90वें दिन तक पुलिस चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई। अभियुक्तों को इसका लाभ मिला और बचाव पक्ष की अपील पर सीजेएम न्यायालय से दोनों को जमानत दे दी गई। न्यायालय ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए विवेचक के खिलाफ कार्रवाई के लिए एसएसपी को लिखा है।
घटना टप्पल के गांव पीपली में 25 सितंबर 2020 को रात 1:20 बजे हुई थी। गांव निवासी नीरज उर्फ नीरू की घर में सोते समय नामजद धर्मवीर, जयवीर, श्यौराज, धर्मेंद्र, सौरव, सोनू, गौरव व भूरा ने पीटकर व गोली मारकर हत्या कर दी थी। फायरिंग पर जगार होने पर नीरज के भाई प्रकाश व पड़ोसी गवाह चरन सिंह और घनेंद्र ने हमलावरों को भागते हुए देखा। प्रकरण में भाई प्रकाश की तहरीर पर नामजद मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें आरोप था कि नामजद आरोपी हरियाणा की शराब की तस्करी करते हैं। नीरज इसका विरोध करता था। इसी रंजिश में यह हत्या की गई है।
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गवाह पक्ष से पैरवी कर रहे अधिवक्ता मुकेश कुमार अत्री के अनुसार, मामले में आगरा के विवेचक ने चार्जशीट लगाने के बजाय गवाहों को बुलाकर डराया धमकाया। कहा कि सही-सही गवाही दो। नियम के अनुसार, जयवीर व भूरा के 26 नवंबर को जेल जाने के बाद फरवरी के अंतिम सप्ताह में 90 दिन पूरे होने पर चार्जशीट दायर करनी थी। मगर चार्जशीट नहीं लगाई। इसी पर दोनों नामजदों की ओर से सीजेएम न्यायालय में जमानत दायर की गई, जिसे मंजूर कर लिया है। साथ ही एसएसपी अलीगढ़ को विवेचक के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा है।
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लाइन हाजिर हुए थे तत्कालीन इंस्पेक्टर
इस घटना की विवेचना तत्कालीन इंस्पेक्टर टप्पल धर्मेंद्र पवार कर रहे थे। उन पर आरोप लगे थे कि वे आरोपियों को कई-कई दिन तक थाने पर बैठाकर रख रहे हैं और छोड़ दे रहे हैं। आरोपों के चलते एसएसपी ने इंस्पेक्टर को लाइन हाजिर कर वहां प्रशिक्षु आईपीएस अभिषेक को प्रभारी इंस्पेक्टर तैनात किया। विवेचना कर आईपीएस अभिषेक ने मामले में दो नामजद जयवीर व भूरा को हत्या में प्रयुक्त तमंचा सहित गिरफ्तार कर 26 नवंबर को जेल भेज दिया।
दो बार बदली विवेचना, पहुंची आगरा
इसके बाद खुद वादी पक्ष की ओर से अधिकारियों से यह अनुरोध किया गया कि उन्होंने उस समय गलत नामजद तहरीर दी थी। उसे थाना पुलिस पर भरोसा नहीं है। इसकी अन्यत्र विवेचना कराई जाए। तब विवेचना क्राइम ब्रांच अलीगढ़ को सौंपी गई। वहां भी जांच उसी दिशा में चली, जिस दिशा में थाना पुलिस चली थी। इस पर वादी ने फिर उच्च अधिकारियों से संपर्क किया और विवेचना को यहां से आगरा जिला पुलिस की क्राइम ब्रांच में स्थानांतरित करा लिया।
- वैसे यह विवेचक स्तर की घोर लापरवाही है। न्यायालय के आदेश के अनुपालन में विवेचना कर रहे आगरा क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर के खिलाफ कार्रवाई के लिए एसएसपी आगरा को लिखा गया है। रहा सवाल जमानत मिलने का तो कानूनन इस दशा में जमानत का प्रावधान है। मगर वे दोनों इस मुकदमे में नामजद आरोपी हैं। इसलिए मुकदमा उनके खिलाफ चलेगा और अग्रिम कार्रवाई कराई जाएगी। - मुनिराज जी, एसएसपी
विशेषज्ञ की राय
वरिष्ठ अधिवक्ता रामबाबू शर्मा कहते हैं कि किसी भी अपराधी के जेल जाने पर निचली अदालत 14-14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा रिमांड अवधि देती है। इस बीच अगर जमानत हो जाए तो ठीक और अगर जमानत भी न हो और 90वें दिन तक चार्जशीट न आए तो इसके आगे न्यायिक अभिरक्षा में नहीं रखा जा सकता। निचली अदालत से ही सीआरपीसी में उसे जमानत देने का प्रावधान है। चूंकि यह हत्या का प्रकरण है, इसलिए इसमें अगर चार्जशीट समय से आ जाती तो शायद सत्र न्यायालय से भी जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता।
क्या कहता है कानून
- अपराधी को जेल भेजने के 90वें दिन तक न्यायालय में चार्जशीट दायर करनी होती है। ऐसा न होने की दशा में न्यायिक अभिरक्षा में अभियुक्त को जेल में नहीं रखा जा सकता है।

- हत्या में जमानत व ट्रायल सुनवाई का अधिकार सत्र न्यायालय को है। मगर, यहां चार्जशीट न आने पर निचली अदालत से ही रिमांड खारिज करने या जमानत देने का प्रावधान है।
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