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निकला न करो बेनकाब, जमाना खराब है

Wed, 31 Jan 2018 02:40 AM IST
Updated Wed, 31 Jan 2018 02:40 AM IST
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निकला न करो बेनकाब, जमाना खराब है
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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शायर के शेरों को जब खास सोज और साजों के साथ सधे स्वर में गाया जाता है तो गजल गायिकी की शुरुआत होती है। मंगलवार को राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी में मशहूर गायक पंकज उधास ने अपनी ऐसी ही गजल गायिकी से समा बांध दिया।

कार्यक्रम का उद्घाटन बरौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक ठा. दलवीर सिंह और एडीएम सिटी श्याम बहादुर सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद पंकज उधास ने सबसे पहले मंच पर आकर नमस्कार अलीगढ़ कहकर अभिवादन किया। उन्होंने प्रस्तुति देने से पहले पंडाल में वीडियो बना रहे सभी कैमरों को बंद करवा दिया।
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यहां तक कि नुमाइश प्रशासन की ओर से बड़ी टीवी स्क्रीनों पर लाइव दिखा रहे कैमरों को भी बंद करवा दिया। इसके बाद पंकज उधास ने वो बड़े खुशनसीब होते हैं, आप जिनके करीब होते हैं, गजल पेश की।
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इसके बाद पंकज उदास ने निकला न करो बेनकाब, जमाना खराब है गजल पेश कर पुरानी यादें ताजा कर दीं। पहले पंकज उदास ने अपनी पसंद की गजलें और उसके बाद जनता की मांग पर कुछ लोकप्रिय गजलें प्रस्तुत कीं। हुई महंगी बहुत ही शराब ये, थोड़ी थोड़ी पिया करो, चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल गजलें पेश कर पुराना दौर ताजा कर दिया।

फिल्म नाम का गीत चिट्ठी आई है, आई है चिट्ठी आई है की डिमांड होती रही और पंकज ने जब उसे प्रस्तुत किया तो सुनने वालों ने हाथों हाथ लिया। कोहिनूर पंडाल मंगलवार को भी भीड़ का इंतजार करता रहा। इस अवसर पर अलीगढ़ में एडीएम रहे अवधेश कुमार तिवारी, पूर्व महापौर शकुंतला भारती सहित अन्य भाजपा नेता व अधिकारी मौजूद थे।
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जब तक कद्र दान रहेंगे, गजल रहेगी: पंकज उधास
अलीगढ़ नुमाइश के कोहिनूर मंच पर प्रस्तुति देने आए मशहूर गजल गायक पंकज उदास पत्रकारों से भी रूबरू हुए। उन्होंने कहा कि वह अलीगढ़ चौथी बार आए हैं और यहां उन्हें बहुत प्यार मिला है।

अदब का शहर अलीगढ़ पूरे विश्व में जाना जाता है। उन्होंने कहा कि पुरानी गजलों से आज की गजल की तुलना नहीं की जा सकती है। गजल एक संगम है, दौर बदलता है तो पुरानी चीजें नए कलेवर में सामने आती हैं। इसलिए जब तक सुनने वाले और गजल के कद्र दान हैं, गजल जिंदा रहेगी।

उन्होंने कहा कि वह 1997 से लगातार अमेरिका में शो कर रहे हैं। वहां भारतीय लोग भारतीय त्योहारों और परंपराओं को यहां से ज्यादा शिद्दत से मनाते हैं। क्योंकि वह भारत से दूर हैं। हिंदी और उर्दू के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह दोनों जुबानें भारत की हैं।


यह वह भाषाएं हैं जो बच्चा घर में माता पिता से सीखता है। अंग्रेजी को तो स्कूल कालेज में जाकर पढ़ता है, तब सीखता है। उन्होंने बताया कि आने वाली जून में उनकी एक नई एलबम रिलीज होने जा रही है। जिसमें गजल को नए जमाने के अनुरूप पेश किया गया है। उम्मीद है वह सुनने वालों को पसंद आएगी।
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