हार के बाद जीता मथुरा का दिल: ये किस्सा है 1957 का...जब अटल ने विरोधी के लिए मांगे वोट, जब्त करा ली अपनी जमानत
लोकसभा चुनाव 2024 में नेताओं की एक दूसरे पर छींटाकसी और तंज सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन एक दौर वो था जब विरोधी के खिलाफ भले ही चुनाव मैदान में हैं, लेकिन सम्मान बरकरार रहता था। हम बात कर रहे हैं अटल बिहारी वाजपेयी की, जिन्होंने चुनाव में विरोधी के लिए अपनी जमानत जब्त करा ली।
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ये बात 1957 की है, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी पार्टी से विरोधी के समर्थन में वोट डालने की अपील की थी। यह दूसरी लोकसभा के चुनाव का समय था। अटल बिहारी वाजपेयी मथुरा लोकसभा क्षेत्र से मैदान में थे। ऐसे में सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे थे।
जनसंघ प्रत्याशी अटल बिहारी वाजपेयी के समर्थन में मथुरा में सभा थी। उनके भाषण के दौरान पार्टी समर्थक उस समय हैरान रह गए, जब अटल ने निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप सिंह को जिताने की अपील की। कहा कि देश की आजादी में उनका बहुत बड़ा योगदान है। हम सभी को उनका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरी परवाह किए बगैर आप राजा साहब को जिता दो। इसके बाद तो मानो कि पूरी चुनावी हवा राजा साहब के पक्ष में हो गई।
उन्होंने ऐसा इसलिए कहा था कि निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपने पक्ष में माहौल खड़ा कर लिया था। राजा महेंद्र प्रताप इस चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जीते। इस तरह अटल ने चुनाव हारकर भी लोगों के दिल जीत लिए और सदैव के लिए अपनी अलग छवि बना ली। इस चुनाव में दिगंबर सिंह कांग्रेस उम्मीदवार थे। अटल की जमानत जब्त हो गई थी। वह मथुरा से चुनाव भले ही हारे लेकिन, उनका मथुरा से अटूट रिश्ता जुड़ गया। 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि उनका पहला कार्यकाल 13 दिन का ही रहा। लेकिन प्रधानमंत्री का पद उनसे कुछ साल ही दूर रहा और 19 मार्च 1998 को वह दोबारा प्रधानमंत्री बने और 2004 तक इस पद पर रहे।
1- राजा महेंद्र प्रताप सिंह 95, 202 वोट- निर्दलीय प्रत्याशी
2- दिगंबर सिंह 69, 209 वोट- इंडियन नेशनल कांग्रेस
3- पूरन सिंह 29,177 वोट- निर्दलीय
4- अटल बिहारी वाजपेयी 23, 620 वोट-जनसंघ
5- सुग्रीव सिंह 8, 993 वोट- निर्दलीय
6- शंकर राव 7, 818 वोट- निर्दलीय
हाथरस के राजा थे महेंद्र प्रताप सिंह
राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1886 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी पत्रकार और लेखक थे। देश की आजादी में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्हें विशेष रूप से प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय निर्वासित सरकार के
राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने के लिए जाना जाता है। राजा साहब ने बिना पासपोर्ट के 50 से अधिक देशों की यात्रा की। विदेश में उन्होंने 31 साल 8 महीने बिताए, जहां उन्होंने देश की आजादी के लिए कई कदम उठाए। उनके द्वारा दान में दी गई जमीन पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना हुआ है। उन्हें हाथरस नरेश राजा हरिनारायण सिंह ने गोद लिया था और अपनी आधी संपत्ति प्रेम विश्वविद्यालय को दान में दे दी थी।