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चरखों को मिली तनहाई, खादी भी हुई पराई

Thu, 01 Oct 2020 11:07 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Thu, 01 Oct 2020 11:07 PM IST
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gandhi jayanti
आलीपुरखेड़ा स्थित गोदाम में कबाड़ हो रहे रखे चरखे - फोटो : MAINPURI
मैनपुरी। जिले में पांच साल से खादी आश्रम बंद पड़ा है। गोदामों में चरखे भी कबाड़ हो गए हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वदेशी अपनाने के लिए खादी को बढ़ावा देने की शुरुआत की थी। इससे न केवल देश में रोजगार बढ़ा, बल्कि विश्व पटल पर भारत को खादी के लिए सम्मान भी मिला। बापू के यही चरखे आज तनहाई में पड़े हुए हैं।
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जिले में लगभग आधा दर्जन खादी आश्रम संचालित थे। यहां चरखे से सूत कातकर उसे खादी भंडारों और कंपनियों को भेजा जाता था। जहां सूत से कपड़ा बुना जाता था। लेकिन शासन की अनदेखी के चलते धीरे-धीरे ये खादी आश्रम बंद होते चले गए। साल 2000 तक आते-आते महज एक ही आश्रम संचालित रह गया। ये आश्रम था आलीपुर खेड़ा स्थित लोक कल्याण आश्रम। यहां सूत कातने का काम किया जाता था। वर्ष 2015 से यह आश्रम भी बंद हो गया। विभागीय अधिकारी इसके पीछे मशीनों से सूत कातना सस्ता होने और सफाई होने को जिम्मेदार बताते हैं।
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तब से ये चरखे धूल फांक रहे हैं। शासन और प्रशासन ने भी दोबारा इन खादी आश्रमों को शुरू कराने के लिए कोई पहल नहीं की। आगरा रोड स्थित खादी की दुकान पर एक शर्ट की कीमत एक हजार रुपये से शुरू होकर चार हजार रुपये तक है। जबकि बाजार में अन्य कपड़े इससे सस्ते हैं। इसके चलते अब खादी केवल राजनेताओं तक ही सिमटकर रह गई है। इससे बिक्री भी काफी कम हो गई है।
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रोजगार को भी लगा झटका
खादी ग्रामोद्योग विभाग के अनुसार जिले में सूत कातने से लगभग पांच सौ लोगों को रोजगार मिलता था। इतना ही नहीं इस काम में बुजुर्ग अधिक संख्या में शामिल थे। इससे उनकी आजीविका चलती थी। जिले में सूत कातने का काम बंद होने के बाद इन लोगों से ये रोजगार भी छिन गया।

जिले में सूत कातने का काम पूरी तरह बंद हो चुका है। आलीपुर खेड़ा में संचालित आखिरी खादी आश्रम में भी पांच साल पहले काम बंद हो चुका है। अब जिले में कहीं भी चरखे से सूत कातने का काम नहीं हो रहा है। - आरजी गौतम, जिला खादी ग्रामद्योग अधिकारी।
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