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Agra News: आगरा के पार्कों से हटेंगे विलायती बबूल, देसी प्रजातियों से आएगी हरियाली
Fri, 19 Jun 2026 02:41 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Updated Fri, 19 Jun 2026 02:41 AM IST
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आगरा। ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) ने शहर के प्रमुख पार्कों और उद्यानों से आक्रामक विदेशी प्रजाति विलायती बबूल (प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा) को हटाकर उसके स्थान पर देशी पौधे एवं झाड़ियों के रोपण का रास्ता साफ कर दिया है। पर्यावरण प्रेमियों और प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत लोगों ने इस निर्णय को आगरा के पर्यावरणीय भविष्य के लिए मील का पत्थर बताया है।
यह निर्णय अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद केसी जैन के टीटीजेड प्राधिकरण को सौंपे गए प्रतिवेदन पर विचार के बाद लिया गया। मंडलायुक्त आगरा नगेंद्र प्रताप की अध्यक्षता में 1 जून, 2026 को आयोजित टीटीजेड प्राधिकरण की बैठक में इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि सार्वजनिक पार्कों में मौजूद विलायती बबूल का आकलन कर उसके स्थान पर देसी प्रजातियों के रोपण की कार्ययोजना तैयार की जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की भावना के अनुरूप पहल
केसी जैन ने 30 मई, 2026 को प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में सर्वोच्च न्यायालय के 20 मार्च, 2026 को पारित महत्वपूर्ण आदेश का उल्लेख करते हुए कहा था कि पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य केवल पौधरोपण नहीं बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना होना चाहिए।
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इन पार्कों में उठाया गया मुद्दा
प्रतिवेदन में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के अधीन आने वाले पालीवाल पार्क, मोतीलाल नेहरू पार्क, संजय पार्क, सर्किट हाउस परिसर और ताज व्यू गार्डन का उल्लेख किया गया। इन पार्कों में वर्षों से फैल रहे विलायती बबूल को चरणबद्ध तरीके से हटाकर स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल पौधों एवं झाड़ियों के रोपण की मांग की गई थी।
क्यों नुकसानदेह है विलायती बबूल
विशेषज्ञ ईकोलॉजिस्ट डॉ. केपी सिंह के अनुसार विलायती बबूल भारत की मूल प्रजाति नहीं है। इसकी तीव्र वृद्धि और घनी शाखाओं के कारण अन्य पौधों को पर्याप्त प्रकाश, नमी और पोषक तत्व नहीं मिल पाते। परिणामस्वरूप देशी घास, झाड़ियां और वृक्षों की नई पौध विकसित नहीं हो पाती। इसके चलते पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों तथा अन्य परागणकारी जीवों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होते हैं।
मजबूत होगी जैव विविधता
पर्यावरण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इन पार्कों में कदम्ब, पीपल, बरगद, गूलर, पाखड़, कुसुम, केंथ, तमाल और बरना जैसे वृक्षों के साथ अडूसा, करील और वज्रदन्ती जैसी देशी झाड़ियों का रोपण किया जाए। इससे पक्षियों और वन्य जीवों को बेहतर आवास मिलेगा, परागण करने वाले कीटों की संख्या बढ़ेगी और शहरी जैव विविधता को नया जीवन मिलेगा।
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यह निर्णय अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद केसी जैन के टीटीजेड प्राधिकरण को सौंपे गए प्रतिवेदन पर विचार के बाद लिया गया। मंडलायुक्त आगरा नगेंद्र प्रताप की अध्यक्षता में 1 जून, 2026 को आयोजित टीटीजेड प्राधिकरण की बैठक में इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि सार्वजनिक पार्कों में मौजूद विलायती बबूल का आकलन कर उसके स्थान पर देसी प्रजातियों के रोपण की कार्ययोजना तैयार की जाए।
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सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की भावना के अनुरूप पहल
केसी जैन ने 30 मई, 2026 को प्रस्तुत अपने प्रतिवेदन में सर्वोच्च न्यायालय के 20 मार्च, 2026 को पारित महत्वपूर्ण आदेश का उल्लेख करते हुए कहा था कि पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य केवल पौधरोपण नहीं बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना होना चाहिए।
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इन पार्कों में उठाया गया मुद्दा
प्रतिवेदन में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के अधीन आने वाले पालीवाल पार्क, मोतीलाल नेहरू पार्क, संजय पार्क, सर्किट हाउस परिसर और ताज व्यू गार्डन का उल्लेख किया गया। इन पार्कों में वर्षों से फैल रहे विलायती बबूल को चरणबद्ध तरीके से हटाकर स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल पौधों एवं झाड़ियों के रोपण की मांग की गई थी।
क्यों नुकसानदेह है विलायती बबूल
विशेषज्ञ ईकोलॉजिस्ट डॉ. केपी सिंह के अनुसार विलायती बबूल भारत की मूल प्रजाति नहीं है। इसकी तीव्र वृद्धि और घनी शाखाओं के कारण अन्य पौधों को पर्याप्त प्रकाश, नमी और पोषक तत्व नहीं मिल पाते। परिणामस्वरूप देशी घास, झाड़ियां और वृक्षों की नई पौध विकसित नहीं हो पाती। इसके चलते पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों तथा अन्य परागणकारी जीवों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होते हैं।
मजबूत होगी जैव विविधता
पर्यावरण विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इन पार्कों में कदम्ब, पीपल, बरगद, गूलर, पाखड़, कुसुम, केंथ, तमाल और बरना जैसे वृक्षों के साथ अडूसा, करील और वज्रदन्ती जैसी देशी झाड़ियों का रोपण किया जाए। इससे पक्षियों और वन्य जीवों को बेहतर आवास मिलेगा, परागण करने वाले कीटों की संख्या बढ़ेगी और शहरी जैव विविधता को नया जीवन मिलेगा।