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डेयरियों में लग गए ताले, दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए बंद हुई योजनाएं
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मैनपुरी। एक जून को वर्ल्ड मिल्क डे है। दूध आज हर परिवार की जरूरत है, लेकिन इसके उत्पादन में लगातार कमी आ रही है। बीते पांच सालों में जिले की सभी बड़ी डेयरियों में ताले लग गए। वहीं दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कोई नई योजना भी शुरू नहीं हो सकी। इससे जिले के पशुपालकों को भी निराशा ही हाथ लगी है।
केवल दूध ही नहीं दूध के उत्पाद जैसे दही, छाछ, मक्खन, चीज, मावा समेत अन्य पदार्थों का हमारे भोजन में अहम योगदान है। पोषण से भरपूर इन खाद्य पदार्थों का उत्पादन कम हो रहा है और खपत बढ़ती जा रही है। लेकिन शासन और प्रशासन दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा है। शासन द्वारा बीते पांच सालों से जहां दूध उत्पादन और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए कोई योजना शुरू नहीं की गई है तो वहीं पूर्व में संचालित योजनाएं भी अब बंद हो चुकी हैं। बीते पांच सालों कामधेनु योजना के तहत संचालित जिले की सभी 54 डेयरियों में भी अब ताला लटक गया है। इसमें चार कामधेनु, 23 मिनी कामधेनु और 27 माइक्रो कामधेनु डेयरियां शामिल थीं।
पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इन डेयरियों से लगभग 20 हजार लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन होता था। इस दूध को जिले में ही विक्रय किया जाता है। इससे जिले में दूध की उपलब्धता आसान थी। लेकिन वर्तमान में डेयरियां बंद होने से ये उत्पादन अब खत्म हो गया है। केवल निजी डेयरियों और निजी पशुपालन से ही दूध की आपूर्ति हो रही है। निजी डेयरियों की अगर बात करें तो जिले में कोई भी डेयरी ऐसी नहीं है जिसकी तुलना कामधेनु डेयरी से की जा सके।
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ऐसे में लगातार जिले में दूध का उत्पादन कम हो रहा है, लेकिन योजना के अभाव में प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
जिले में खपत के सापेक्ष दूध का उत्पादन कम है। शहर से लेकर देहात तक मिठाइयां बनाने के लिए मावा गैर जिलों से मंगाया जाता है। आगरा और फिरोजाबाद से मुख्य रूप से मावा की आपूर्ति जिले को होती है। अगर जिले में ही पर्याप्त मात्रा में दूध का उत्पादन होता तो बाहर से मावा नहीं मंगाया जाता।
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केवल दूध ही नहीं दूध के उत्पाद जैसे दही, छाछ, मक्खन, चीज, मावा समेत अन्य पदार्थों का हमारे भोजन में अहम योगदान है। पोषण से भरपूर इन खाद्य पदार्थों का उत्पादन कम हो रहा है और खपत बढ़ती जा रही है। लेकिन शासन और प्रशासन दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा है। शासन द्वारा बीते पांच सालों से जहां दूध उत्पादन और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए कोई योजना शुरू नहीं की गई है तो वहीं पूर्व में संचालित योजनाएं भी अब बंद हो चुकी हैं। बीते पांच सालों कामधेनु योजना के तहत संचालित जिले की सभी 54 डेयरियों में भी अब ताला लटक गया है। इसमें चार कामधेनु, 23 मिनी कामधेनु और 27 माइक्रो कामधेनु डेयरियां शामिल थीं।
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पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इन डेयरियों से लगभग 20 हजार लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन होता था। इस दूध को जिले में ही विक्रय किया जाता है। इससे जिले में दूध की उपलब्धता आसान थी। लेकिन वर्तमान में डेयरियां बंद होने से ये उत्पादन अब खत्म हो गया है। केवल निजी डेयरियों और निजी पशुपालन से ही दूध की आपूर्ति हो रही है। निजी डेयरियों की अगर बात करें तो जिले में कोई भी डेयरी ऐसी नहीं है जिसकी तुलना कामधेनु डेयरी से की जा सके।
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ऐसे में लगातार जिले में दूध का उत्पादन कम हो रहा है, लेकिन योजना के अभाव में प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
जिले में खपत के सापेक्ष दूध का उत्पादन कम है। शहर से लेकर देहात तक मिठाइयां बनाने के लिए मावा गैर जिलों से मंगाया जाता है। आगरा और फिरोजाबाद से मुख्य रूप से मावा की आपूर्ति जिले को होती है। अगर जिले में ही पर्याप्त मात्रा में दूध का उत्पादन होता तो बाहर से मावा नहीं मंगाया जाता।