भारत-पाक विभाजन के बाद सरहद के दोनों तरफ मनाया जाता था मिंजर मेला
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ऐतिहासिक मिंजर मेले की परंपरा को दशकों तक सरहद की सीमा भी नहीं रोक पाई। हैरत की बात है कि सदियों पुरानी परंपरा को भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद दशकों तक दोनों तरफ मनाया जाता रहा। चंबा रियासत में इस मेले की परंपरा जहां वर्ष 1934 से शुरू थी जो आज भी जारी है, वहीं पाकिस्तान में विभाजन के बाद से शुरू हुई परंपरा वर्ष 1992 में तत्कालीन शासक की मौत के साथ ही खत्म हो गई।
जानकारी के अनुसार वर्ष 1992 तक पाकिस्तान के रावलपिंडी जिला के कोहटा स्थित मोहल्ला कश्मीरी में चंबा जिले की भांति ही मिंजर मेले को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा। बताया जाता है कि वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद पाकिस्तान में बसे चंबा के लोगों के साथ मिंजर मनाने की परंपरा शुरू की गई। तत्कालीन मुस्लिम शासक इकबाल ने लोगों को इस्लामाबाद आमंत्रित किया। साथ ही शर्त रखी कि लोगों को अपने खर्चे पर ही इस्लामाबाद आना होगा।
इस्लामाबाद में मिंजर मेला मनाने के लिए पहुंचे लोगों के खाने के लिए चंबा की तरह ही व्यंजन (बबरू, माश की दाल, धुली मूंग, कड़ी, खट्टा) बनाए जाते रहे, लेकिन वर्ष 1992-93 में मुस्लिम राजा इकबाल की मौत के बाद पाकिस्तान में मिंजर मेले की परंपरा भी बंद हो गई।
देश से बाहर पाकिस्तान में मिंजर मेला मनाने के लिखित में प्रमाण भी हैं। आजादी के बाद पाकिस्तान जाकर बसे चंबा के लोगों की ओर से चंबा में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को भेजे गए पत्र इस समृद्ध परंपरा की तसदीक करते हैं। चंबा में रहने वाले लोगों के पास यह पत्र आज भी मौजूद हैं। इन पत्रों में भी जानकारी है कि इस्लामाबाद के शासक इकबाल अपनी प्रजा के सुख-दुख और तीज-त्योहारों को मनाने के लिए उसमें शरीक हुआ करते थे।
नप चंबा के रिकॉर्ड में दर्ज है पाकिस्तान का न्योता
आर्ट टीचर असगर बेग ने बताया कि नगर परिषद चंबा के रिकॉर्ड में मिंजर को पाकिस्तान में मनाए जाने की बात आज भी दर्ज है। पाकिस्तान (रावल पिंडी) से नप चंबा के अध्यक्ष पंडित सरदारी लाल को पत्र लिख कर मिंजर मेले के लिए आमंत्रित किया गया था। देश आजाद होने पर वर्ष 1947 में उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान जाकर बसे थे। उनके रिश्तेदार पत्र लिख कर अक्सर रावलपिंडी के कोहटा स्थित कश्मीरी मोहल्ला में मनाए जाने वाले मिंजर मेले का जिक्र किया करते थे।