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हिमाचल हाईकोर्ट के बड़े फैसले: प्रमोशन के लिए योग्यता तय करना सरकार का नीतिगत फैसला

Tue, 06 Oct 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 06 Oct 2026 05:00 AM IST
सार

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पदों का गठन, योग्यता तय करना और प्रमोशन के रास्ते निर्धारित करना पूरी तरह से राज्य सरकार का नीतिगत फैसला है। जानिए हाईकोर्ट के बड़े फैसले

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Himachal High Court Major rulings: Determining eligibility for promotion is a policy decision of the govt.
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के पदोन्नति नियमों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पदों का गठन, योग्यता तय करना और प्रमोशन के रास्ते निर्धारित करना पूरी तरह से राज्य सरकार का नीतिगत फैसला है। किसी भी कर्मचारी के पास प्रमोशन पाने का कोई मौलिक अधिकार नहीं होता, उसका मौलिक अधिकार सिर्फ प्रमोशन के लिए उसके नाम पर विचार किए जाने तक सीमित है। याचिकाकर्ता नवीन चंद्र भडवाल ने वर्ष 2024 के नए नियमों को चुनौती दी थी, जिसमें ओवरसियर ऑफसेट पद के लिए 2010 की अनिवार्य डिप्लोमा शर्त हटा दी गई थी। सरकार ने दलील दी कि फीडर कैडर के अनुभवी कर्मचारियों को अवसर देने के लिए जनहित में यह बदलाव किया गया, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह तर्कसंगत माना।

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न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि किसी पद के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए, यह तय करना पूरी तरह से सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। संविधान के तहत किसी कर्मचारी को यह गारंटी नहीं है कि उसे प्रमोशन मिलेगा ही। उसका अधिकार सिर्फ इतना है कि जब भी प्रमोशन कमेटी बैठे, तो वरिष्ठता के आधार पर उसके नाम पर भी निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए। कोर्ट ने नोट किया कि नए नियमों से याचिकाकर्ता का प्रमोशन का अधिकार खत्म नहीं हुआ है। जब भी पद खाली होगा और डीपीसी बैठेगी, वरिष्ठता के आधार पर उसके नाम पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने उन कर्मचारियों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया था, जो इस फैसले से प्रभावित हो सकते थे। हाईकोर्ट ने सरकार के जवाब को पूरी तरह से तर्कसंगत माना और कहा कि नियमों में बदलाव किसी दुर्भावना या किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं किया गया है।

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स्कूलों के लिए दी थी जमीन, अब वापसी के लिए अदालत पहुंच रहे लोग
 सरकारी स्कूलों के लिए वर्षों पहले दान अथवा उपहार स्वरूप दी गई जमीनों को लेकर हिमाचल प्रदेश में नया विवाद खड़ा हो गया है। कई मामलों में भूमि मालिकों की ओर से जमीन वापस मांगे जाने और अदालतों का दरवाजा खटखटाने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आ गया है। हाईकोर्ट में लंबित एक मामले के संदर्भ में स्कूल शिक्षा निदेशालय ने प्रदेश के सभी जिला उपनिदेशकों से ऐसे मामलों की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। निदेशालय ने पूछा है कि प्रदेश में कितने ऐसे मामले हैं, जहां सरकारी स्कूल खोलने या भवन निर्माण के लिए लोगों ने भूमि दान की थी, लेकिन अब स्कूलों के बंद होने, विलय होने अथवा अन्य कारणों से जमीन वापस लेने की मांग उठ रही है। विभाग ने अदालतों में लंबित मामलों के साथ-साथ प्रतिनिधित्व और शिकायतों का भी पूरा ब्योरा मांगा है।

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शिक्षा विभाग ने जिलों से चार अलग-अलग श्रेणियों में सूचना मांगी है। इनमें ऐसे स्कूल शामिल हैं, जो बंद या दूसरे स्कूलों में विलय हो चुके हैं और भूमि संबंधी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। जहां दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन भूमि वापसी को लेकर विवाद चल रहा है। जो अभी भी संचालित हैं, फिर भी भूमि मालिक जमीन लौटाने की मांग कर रहे हैं। जहां भूमि दान की गई थी, लेकिन गिफ्ट डीड, इंतकाल और अन्य कानूनी दस्तावेज कभी पूरे नहीं किए गए। निदेशालय ने उन मामलों का भी विवरण मांगा है, जहां स्कूलों के लिए भूमि तो ली गई, लेकिन आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं। ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम भी रिपोर्ट में शामिल करने को कहा गया है। इससे वर्षों पुरानी फाइलों और भूमि रिकॉर्ड की भी जांच हो सकती है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार प्रदेश के अनेक ग्रामीण इलाकों में स्थानीय लोगों ने शिक्षा के प्रसार के लिए अपनी निजी भूमि स्वेच्छा से स्कूलों को दान की थी। हालांकि समय के साथ कुछ स्कूल बंद हुए, कई का विलय कर दिया गया और अनेक स्थानों पर भूमि से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रूप से सुरक्षित नहीं रखे गए। अब इन्हीं मामलों को लेकर कानूनी विवाद सामने आ रहे हैं।

कसौली के वुडविला में अवैध निर्माण और पेड़ कटान पर एसडीएम को जांच के आदेश
 प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कसौली में चल रहे अवैध निर्माण और वर्षों पुराने चीड़, देवदार के पेड़ों की कटाई पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने जिला प्रशासन को निर्माण स्थल पर तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने यह कार्रवाई कसौली के लोअर माल स्थित फिरोजी विला की निवासी की ओर से भेजी गई एक ईमेल शिकायत पर की है। हाईकोर्ट ने एसडीएम कसौली को निर्देश दिया है कि वह तुरंत मौके पर जाकर औचक निरीक्षण करें। आरोप लगाया गया था कि उनके घर के बगल में स्थित संपत्ति वुडविला में भारी मशीनों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर अवैध खोदाई की जा रही है। इस खोदाई से चीड़ के पेड़ों को अवैध रूप से काट दिया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार 27 सितंबर 2026 को दोपहर करीब 1:30 बजे भारी मशीनों से चार बड़े चीड़ के पेड़ों को काटा गया और उनकी जड़ों को पूरी तरह खोद दिया गया। इस अंधाधुंध खोदाई के कारण वहां बचे हुए अन्य भारी-भरकम पेड़ों की जड़ें कमजोर हो गई हैं, जिससे वे कभी भी शिकायतकर्ता के घर की छत पर गिर सकते हैं और जानमाल का बड़ा नुकसान हो सकता है। आरोप है कि इसके लिए वन विभाग से कोई अनुमति नहीं ली गई है। कोर्ट ने पूछा है कि क्या मौके पर सच में अवैध रूप से पेड़ काटे गए हैं? क्या इस निर्माण और पेड़ों की कटाई के लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई वैध मंजूरी ली गई थी? एसडीएम को इसकी एक स्वतंत्र स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करनी होगी। शिकायतकर्ता की ओर से ईमेल के साथ भेजी गई पेड़ों की कटाई की तस्वीरों को कोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया है और उन्हें पेन ड्राइव में सुरक्षित रखने को कहा है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि मंजूरी के कागजात नहीं मिले, तो जरूरी कानूनी आदेश पारित किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी,तब तक प्रशासन को अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी।

चिट्टा बरामदगी मामले में आरोपी की जमानत खारिज
ढली थाना क्षेत्र के संजौली में कमरे से चिट्टा बरामदगी मामले में आरोपी की जमानत याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया है। विशेष न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट एवं सीबीआई कोर्ट शिमला डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने 7.740 ग्राम चिट्टा बरामदगी में आरोपी की नियमित जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी के कमरे में मादक पदार्थ के साथ वजन तोलने वाली मशीन का मिलना यह दर्शाता है कि वह केवल नशे का आदी ही नहीं है, बल्कि इसे आगे बेचने में भी संलिप्त है। इसके अलावा आरोपी के खिलाफ पहले से भी एनडीपीएस एक्ट का एक मामला विचाराधीन है। ऐसे में जमानत मिलने पर दोबारा अपराध दोहराने की प्रबल आशंका है जिसके चलते आरोपी को जमानत पर रिहा करना न्यायहित में नहीं होगा। अभियोजन पक्ष के अनुसार दो अगस्त 2026 की रात को ढली पुलिस थाना की टीम जब गश्त पर थी तो उन्हें गुप्त सूचना मिली की ठियोग निवासी आरोपी दीपक वर्मा संजौली क्षेत्र में चिट्टे की खरीद-फरोख्त कर रहा है। पुलिस ने संजौली स्थित आरोपी केे कमरे में पर दबिश दी तो उन्हें 7.740 ग्राम चिट्टा और पॉकेट वजन तोलने की मशीन बरामद हुई । पुलिस ने मौके पर आरोपी और सह-आरोपी को गिरफ्तार किया। जांच में सामने आया कि बरामद चिट्टा चंडीगढ़ के रजनीश दादा से खरीदा गया था जिसके लिए ऑनलाइन लेन देन के जरिये भुगतान किया गया था। आरोपी दीपक वर्मा के खिलाफ 2025 में भी ढली थाने में एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए आरोपी को जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।

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