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प्रियंका गांधी के जमीन मामले में हाईकोर्ट ने थमाया नोटिस

Fri, 07 Aug 2015 11:02 PM IST
Updated Fri, 07 Aug 2015 11:02 PM IST
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high court notice to information commession in priyanka land case.

प्रियंका गांधी वाड्रा जमीन की सूचना से संबंधित मामले में प्रदेश हाई कोर्ट ने मुख्य सूचना आयुक्त भीम सेन और राज्य सूचना आयुक्त केडी बातिश को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाए।अदालत ने अपने आदेशों में कहा कि इन प्रतिवादियों ने हाई कोर्ट के स्थगन आदेशों के बावजूद जानबूझकर इस मामले पर सुनवाई जारी रखी।

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अदालत ने इन दोनों को मामले की आगामी सुनवाई के दौरान निजी तौर पर उपस्थित रहने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश पीएस राणा की खंडपीठ ने उक्त आदेश प्रार्थी प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से दायर अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किए।
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याचिका में लगाए गए हैं ये आरोप

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अदालत ने सूचना आयोग के समक्ष लंबित प्रियंका गांधी वाड्रा जमीन खरीद-फरोख्त की सूचना से संबंधित मामले की आगामी सुनवाई पर रोक लगा दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि गत सात जुलाई को प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग के उस निर्णय के अमल पर रोक लगा दी थी, जिसके तहत राज्य सूचना आयोग ने डीसी और एसडीएम शिमला को दस दिन की अवधि में वांछित सूचना उपलब्ध करवाने के आदेश दिए थे।

आयोग ने इस मामले पर सुनवाई जारी रखी और डीसी एवं एसडीएम शिमला से प्रियंका गांधी वाड्रा जमीन मामले का सारा रिकॉर्ड आगामी 20 अगस्त को तलब किया है। हालांकि, प्रार्थी ने हाई कोर्ट की ओर से पारित स्थगन आदेश के बारे में सूचित किया था। प्रार्थी ने देव आशीष भट्टाचार्य को निजी तौर पर प्रतिवादी बनाया है।

पढ़िए, ये है पूरा मामला

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ज्ञात रहे कि प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से आयोग के 29 जून के निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट के समक्ष याचिका दायर की है, जिसमें हाई कोर्ट ने राज्य सूचना आयोग की ओर से पारित इस निर्णय के अमल पर रोक लगा दी थी।

इसके तहत आयोग ने डीसी और एसडीएम शिमला को दस दिन की अवधि में वांछित सूचना उपलब्ध करवाने के आदेश दिए थे। हाई कोर्ट के समक्ष दलील दी गई कि प्रार्थी की जान को खतरा है। उसे एसपीजी सुरक्षा मुहैया करवाई गई है।

उसके बारे में मांगी गई सूचना थर्ड पार्टी सूचना है और जनहित से नहीं जुड़ी है, जो अथॉरिटी उपलब्ध करवाने के लिए कानूनन बाध्य नहीं है। प्रार्थी ने दलील दी कि आयोग की ओर से सूचना उपलब्ध करवाने के बारे में पारित किया गया आदेश न्यायसंगत नहीं है, इसलिए इसे रद्द किया जाए।

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