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358 साल पहले काशी में तपस्या करने आए थे गुरु तेग बहादुर साहिब, आज भी साक्ष्य हैं मौजूद

Thu, 13 Dec 2018 01:39 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Thu, 13 Dec 2018 01:39 PM IST
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guru teg bahadur sahib came kashi 358 years ago
varanasi - फोटो : अमर उजाला
सिख धर्म के नौवें गुरु तेग बहादुर साहिब का काशी से भी नाता रहा है। 358 साल पहले वो काशी आए थे और नीचीबाग में सात माह 16 दिन की तपस्या की थी। उन्होंने अपने तप के बल पर ही जमीन से गंगाजल निकाल दिया था। जहां आज भी लोग वहां का अमृत पाने के लिए पहुंचते हैं। आज गुरु तेग बहादुर का 343वां शहीदी चर्तुदिक पर्व गुरुपर्व मनाया जा रहा है। तो आइए आज जानते हैं काशी से जुड़ी उनकी यादें.....
guru teg bahadur sahib came kashi 358 years ago
varanasi - फोटो : अमर उजाला
गुरु तेग बहादुर साहिब पंजाब से चलकर दिल्ली, आगरा, मथुरा, कानपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर और चुनार होते हुए 1660 ई. में काशी पहुंचे। गुरु नानक देव के अनुयाई भाई कल्याण को जब यह जानकारी मिली तो उनके दर्शन के लिए अपने आवास नीचीबाग में तैयारियां की। यहां गुरु तेग बहादुर ने सात माह 16 दिन तक गुरुनानक के उपदेश श्रद्धालुओं को दिए। 
 
guru teg bahadur sahib came kashi 358 years ago
varanasi - फोटो : अमर उजाला
नीचीबाग गुरुद्वारा के मुख्य ग्रंथी भाई हरभजन सिंह ने बताया कि उनके आगमन के दौरान ही एक घटना घटी। पूर्णिमा के दिन कल्याण भाई ने गुरुतेग बहादुर से कहा कि आज सैकड़ों श्रद्धालु काशी गंगा स्नान करने आ रहे हैं। इसलिए आपका आदेश हो तो हम भी गंगा स्नान करके आ जाएं?


 
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guru teg bahadur sahib came kashi 358 years ago
varanasi - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने कहा कि गंगा कितनी दूर हैं तो बताया कि आधा मील इस पर उन्होंने ध्यान करते हुए घर में रखे एक पत्थर को हटाया तो वहां से एक निर्मल जलधार निकल पड़ी। इसे देख कल्याण भाई आश्चर्य चकित हो गए। जब घर आंगन में पानी भरने लगा तो गुरुजी के आदेश अनुसार पत्थर की शिला उसके स्थान पर रख दी। इस जल का स्रोत आज भी उस बाऊली साहिब के रूप में मौजूद है। इस जल का अमृत पान करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं।
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guru teg bahadur sahib came kashi 358 years ago
varanasi - फोटो : amar ujala
मान्यता है कि आज भी उस जल के सेवन से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। जाते समय उन्होंने मखमली चोला कुर्ता निशानियां और चरण पादुका छोड़कर चले गए, जो आज भी उस गुरुद्वारे में संरक्षित है। इसके दर्शन पूजन के लिए लोग उमड़ते हैं। 
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