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आजादी के महानायक शहीद मंगल पांडे की 188वीं जयंती आज, जानिए उनके बारे में

Tue, 30 Jan 2018 03:36 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,बलिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,बलिया Updated Tue, 30 Jan 2018 03:36 PM IST
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freedom fighter mangal pandey birthday today
मंगल पांडे - फोटो : pti
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बात उठते ही एक व्यक्ति का नाम सबकी जुबान पर आ जाता है, वो है मंगल पांडे का। भारत के प्रथम क्रांतिकारी के रूप में प्रसिद्ध मंगल पांडे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी कहलाते हैं। आज उनका 188 वीं जयंती है। वैसे तो पूरे देश में 19 जुलाई को क्रांतिकारी मंगल पांडे की जयंती मनाई जाती है लेकिन उनके जन्म स्थान बलिया में 30 जनवरी को जयंती मनाई जाती है। बलिया के इस वीर सपूत की जयंती और बलिदान दिवस पर पूरे जिले में कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। आइये जानते हैं लोकतंत्र के पहरुए मंगल पांडेय के बारे में कुछ खास बातें...
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mangal pandey - फोटो : अमर उजाला
आजादी की जंग में सबसे पहले अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी हुकूमत के चूल हिलाने वाले शहीद मंगल पांडेय में शुरू से ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का जज्बा था । उनके इसी जज्बे ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बने आंदोलन में लोगों के अंदर स्वाभिमान जगाने का काम किया।  30 जनवरी 1831 को तत्कालीन गाजीपुर जिले के बलिया तहसील अंतर्गत नगवा गांव की मिट्टी में मंगल पांडेय का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

 
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mangal pandey - फोटो : अमर उजाला
पिता का नाम सुदिष्ट पांडेय तथा माता का नाम जानकी देवी था। मंगल पांडेय 22 वर्ष की आयु में ईस्ट इंडिया कंम्पनी की सेना में भर्ती हुए। उस समय सेना में धर्म के अनुसार वेशभूषा में रहने की छूट थी, हिंदू सिपाहियों के लिए माथे पर तिलक लगाना और मुसलमान सिपाहियों को दाढ़ी रखना आम बात थी। उस समय सेना में अंग्रेजों की ओर से सैनिकों को ईसाई बनाने का कुचक्र चल रहा था। 

 
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mangal pandey - फोटो : facebook
पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में एक फैक्ट्री थी,जहां कारतूस बनाए जाते थे, उस फैक्ट्री के अधिकांश कर्मचारी दलित समुदाय के थे। एक दिन प्यास लगने पर फैक्ट्री के एक कर्मचारी ने सैनिक मंगल पांडेय से एक लोटा पानी मांगा। उन्होंने यह कहकर पानी देने से मना कर दिया कि वह अछूत है। कर्मचारी को यह बात चुभ गई।  
 
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mangal pandey - फोटो : अमर उजाला

उसने मंगल पांडेय से कहा कि उस समय तुम्हारा धर्म कहां रह जाता है, जब बंदूक में कारतूस डालने से पहले उसे दांत से तोड़ते हो। उस कारतूस पर गाय और सूअर की चर्बी लगी होती है। वह दलित कर्मचारी मातादीन था। जिसने भारतीय सैनिकों की आंखें खोल दी।  इसके बाद मंगल पांडेय अंग्रेजों से बदला लेने के लिए मौके की तलाश में लग गए। 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय ने अंग्रेजो के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और परेड ग्राउंड में ही बगावत कर अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया।



 
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