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दो साल आठ महीने बाद मिली सफलता, देश के बौद्धिक संपदा अधिकार में शामिल हुआ ये उत्पाद

Tue, 26 Mar 2019 11:18 AM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Tue, 26 Mar 2019 11:18 AM IST
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Balua stone of chunar involve in intellectual property rights

कलात्मक दृष्टिकोण से बलुआ पत्थर का महत्व तो सभी को पता है। लेकिन, क्या आपको पता है कि हमारे देश में बलुआ पत्थर पाए कहां जाते हैं? उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली जिले में। यूं तो देश के कई अन्य हिस्सों में भी बलुआ पत्थर मिलते है, लेकिन कलात्मक पत्थरों में शुमार चुनार बलुआ पत्थर को देश के बौद्धिक संपदा अधिकार में शामिल किया गया है। देखें आगे की स्लाइड्स में...

Balua stone of chunar involve in intellectual property rights

बलुआ पत्थर देश में नेचुरल गुड्स में दूसरा पंजीकृत जीआई (भौगोलिक संकेतक) उत्पाद है। यह जानकारी जीआई विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने सोमवार को दी। डॉ. रजनीकांत ने बताया कि अब इस बहुमूल्य पत्थर पर मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली जिले का कानूनी अधिकार है। अब यहीं से निकलने वाले पत्थर को ही चुनार बलुआ पत्थर कहा जाएगा। डॉ. रजनीकांत ने बताया कि चुनार बलुआ पत्थर को जीआई उत्पाद के तौर पर पंजीकृत कराने के लिए 25 जुलाई 2016 को चेन्नई के जीआई कोर्ट में आवेदन किया गया था। दो साल आठ माह की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मार्च 2019 में चुनार बलुआ पत्थर को बौद्धिक संपदा का दर्जा मिला है। इसके साथ ही यह काशी क्षेत्र का 11वां जीआई पंजीकृत उत्पाद हो गया है और छह अन्य क्राफ्ट जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया चल रही है। 

Balua stone of chunar involve in intellectual property rights

इससे पहले बनारसी साड़ी और ब्रोकेड, भदोही कार्पेट, लकड़ी के खिलौने, मेटल रेपोजी, गुलाबी मीनाकारी, ग्लास बीड्स, ब्लैक पाटरी, गाजीपुर वाल हैंगिंग, सॉफ्ट स्टोन जाली क्राफ्ट, मिर्जापुर दरी जीआई पंजीकृत उत्पाद हैं। डॉ. रजनीकांत के अनुसार मौजूदा समय में देश के विभिन्न हिस्सों में 1000 शिल्पी चुनार के बलुआ पत्थर पर नक्काशी उकेरने का काम कर रहे हैं और इसका सालाना कारोबार लगभग 2000 करोड़ रुपये का है। सरकार के इस प्रयास से अब इस प्राकृतिक उत्पाद को सही मायने में संरक्षित किया जा सकेगा।

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Balua stone of chunar involve in intellectual property rights

चुनार बलुआ पत्थर जितना ही पुराना होगा, उसमें मौजूद बलुआ कणों और उसके घनत्व के कारण उसकी चमक वायु घर्षण से बढ़ती जाएगी। इसके साथ ही पानी के अंदर सैकड़ों वर्षों तक रहने के बावजूद यह खराब नहीं होता है। विंध्य पर्वत माला और गंगा किनारे की विशिष्ट प्राकृतिक संरचना के कारण चुनार बलुआ पत्थर अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।

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चुनार बलुआ पत्थर का इस्तेमाल सारनाथ म्यूजियम में रखी अशोक की लाट, चुनार किला, रामनगर फोर्ट, बनारस के गंगा घाटों, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के मुख्य भवन, सारनाथ के मुख्य बौद्ध मंदिर, थाई मंदिर में बनी कंधार शैली की 80 फीट ऊंची मूर्ति के अलावा मथुरा व वृंदावन के मंदिरों में किया गया है।

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