हम तो बेजुबान हैं, हमें क्या मालूम कोर्ट-कचहरी। खुले रेत पर दौड़ने के आदी हम इन चहारदीवारों में कब तक कैद रहेंगे। हमारी क्या खता, जिसकी सजा मिल रही...यह दर्द रेगिस्तान के जहाज कहे जाने वाले उन 15 ऊंटों का है, जिसे कोई सुन और समझ नहीं पा रहा है। पिछले एक माह से सभी रामनगर के भीटी स्थित अहाते में कैद हैं। हाईवे से सटे लगभग तीन बिस्वा के इस हाते में ऊंट सही तरीके से रह भी नहीं पा रहे हैं।
बांग्लादेश तक फैला है तस्करों का जाल: काशी में लाचार हैं 'रेगिस्तान के जहाज', एक माह से हाते में बंद हैं सभी
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ऊंट हाईवे से गुजरने वाली गाड़ियों के दिन-रात के शोर से परेशान हैं। परिसर में बारिश से हुए कीचड़ में दिन-रात उठ बैठ रहे ऊंटों को बीमारियां भी जकड़ रही हैं। कीचड़ से बचाव के लिए गिट्टी-पत्थर डाला गया, उस पर बैठने और चलने में ऊंटों को पैरों में घाव हो रहे हैं। दो ऊंटों की हालत ठीक नहीं है। एक ऊंट तो अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा है। जबकि एक मादा ऊंट की 24 जुलाई को मौत भी हो चुकी है।
27 जून को गौ-ज्ञान फाउंडेशन की सूचना पर रामनगर पुलिस ने हाईवे से 16 ऊंटों को ट्रक से बरामद किया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत से तस्करी कर बंगाल ले जाते समय दो तस्करों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। रमैया चैरिटेबल ट्रस्ट के लगभग 30 वालेंटियर ऊंटों की देखरेख कर रहे हैं। ट्रस्ट की सचिव स्वाती बालानी के अनुसार ऊंटों को यह वातावरण रास नहीं आ रहा है। रेत पर चलने के आदी इन ऊंटों के पैर अब जवाब दे रहे हैं।
बांग्लादेश तक फैला है ऊंट तस्करों का जाल
वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि ऊंट तस्करों का जाल राजस्थान से लेकर बांग्लादेश तक फैला है। बागपत से ऊंटों को ट्रक में लादकर फर्जी खेती-बारी के कागजात तैयार कर पश्चिम बंगाल भिजवाया जाता है। यूपी, बिहार, झारखंड के पाकुड़ से होकर यह ऊंट पश्चिम बंगाल के मालदा पहुंचाए जाते हैं। मालदा में नाव के जरिये इन ऊंटों को बांग्लादेश की सीमा में प्रवेश करा दिया जाता है। वन अधिकारियों के अनुसार ऊंटों को जल्दी से जल्दी पहुंचाने के चक्कर में चारों पैर और मुंह को रस्सी से बांधकर ट्रक में भूसे की तरह ठूंस दिया जाता है। 20 से 25 घंटे तक ऐसे ही ऊंट सफर करते हैं।
ऊंट खुले में रहने वाले जीव हैं। इन्हें खाने में सूखी घास जैसे बरसीम चारा पसंद है। सूखे स्थान पर रहना इनके स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। शेड के नीचे इन्हें नहीं रखना चाहिए। - डॉ. राघव मिश्रा, जंतु विज्ञान विभाग, बीएचयू