‘सेना को इतना मत रोको सैनिक बागी हो जाए’ मेरठ में कवि सम्मेलन व मुशायरे में दिखा देशभक्ति का जोश
हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा के माइक लेते ही मुशायरे में आई रौनक
उन्होंने कहा कि राममंदिर बने यह राजा का काम नहीं, राजा का काम है कि पूरा देश मंदिर जैसा बने। कहा कि राजा का काम नहीं कि वह दलितों के घर भोजन करे। राजा का काम है कि हर दलित उसकी तरह भोजन करे। उन्होंने देश के बाहर काम करने जा रहे युवाओं को सीख दी। कहा कि मेरा सुख इसमें नहीं कि बेटा अमेरिका में रहकर पांच लाख महीना कमाए, मेरा सुख इसमें है कि मेरा बेटा इसी देश में रहकर पचास हजार कमाए पर शाम का खाना मेरे साथ खाए। कहा कि बच्चों पर पढ़ाई का बोझ न डालें। उन्हें तनाव न दें।
‘सेना को इतना मत रोको सैनिक बागी हो जाए....’
इससे पूर्व अजीम शायर नवाज देवबंदी ने गज़ल और शेरों का नज़राना पेश किया, तो महफिल ने हर मिसरे पर अदब से दाद दी। उन्होंने कहा कि, ‘एक आंखों के पास है, एक आंखों से दूर, बेटा हीरा होता है, बेटी कोहिनूर। ‘मां के लिए शेर पढ़ा, ‘उसकी एड़ी पर्वत चोटी लगती है, मां के पांव से जन्नत छोटी लगती है’। सुनकर पूरे पंडाल में श्रोता भाव-विभोर हो गए।
इसके बाद उन्होंने सुनाया ‘जीने के सिर्फ एक बहाने में मर गए, हम जिंदगी का बोझ उठाने में मर गए। अच्छा था घर की आग बुझाने में मरते हम, अफसोस अपनी जान बचाने में मर गए।‘ देश के हालात पर उन्होंने शेर पढ़ा, जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है, आग के पीछे तेज हवा है, आगे मुकद्दर आपका है।
अलवर से आए ओज के कवि विनीत चौहान ने देशभक्ति की रचनाएं पेश की तो पूूरा पंडाल भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा। उन्होंने कहा ‘किसका खून नहीं खोलेगा पढ़ पढ़कर अखबारों में, शेरों की गर्दन कटवा दी कुत्तों के दरबारों में। इतना खून नहीं छिड़को कि मौसम बागी हो जाए। सेना को इतना मत रोको सैनिक बागी हो जाए’... सुनकर पूरे माहौल में जोश भर गया। उन्होंने सुनाया कि आतंकी कैसे घुस आए लाहौरी दरबारों से, लगता है कुछ चूक हुई है अपने चौकीदारों से। जिस दिन गोली का उत्तर हम गोली से दे पाएंगे, उस दिन आतंकी क्या उनके बाप भी ठीक हो जाएंगे, सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी।
पति को देश पर पहले ही वार दिया, अब अपनी भी सांस वार कर जाऊंगी...।
अभी तकल्लुफ है गुफ्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है....
उन्होंने नज्म भी पढ़ी, ‘तू रास्ते का मुसाफिर रहे, तेरी एक एक ठोकर उठा लाऊंगी अपनी बेचैन पलकों से चुन छू के मैं, तेरे रास्ते से पत्थर उठा लाऊंगी।
हास्य व्यंग्य के जाने माने कवि शंभू शिखर ने अपनी जबरदस्त कविताओं से छाप छोड़ी। ‘चेहरे पर एक रुआब नया चढ़ भी जाता है, इतिहास एक नया मुकाम गढ़ भी जाता है। कवि सम्मेलन और मुशायरे का संचालन डॉ. प्रवीण शुक्ल ने किया।