दुनियाभर में वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर हर कोई जागरूक है। सरकारें इसको लेकर तमाम प्रयास भी कर रही हैं, लेकिन हस्तिनापुर सेंक्चुरी का क्षेत्र बनने के 33 साल बाद भी अधर में है। सालों से यहां रहने वाले जीव जंतुओं का घर तय नहीं हो पाया है। सेंक्चुरी का इलाका 2073 वर्ग किमी रहेगा या फिर इसे 450 वर्ग किमी कर दिया जाएगा। सीमा तय न होने से क्षेत्र में इंसानों का ज्यादा दखल है। ऐसे में वन्य जीवों को सुरक्षित रखना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है।
हस्तिनापुर अभ्यारण्य के वन्य जीवों को इंसानों से खतरा, 33 साल से तय नहीं हो पाई सेंक्चुरी की सीमा
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सन् 1986 में गंगा नदी के दोनों तटों पर अवस्थित खादर मैदानों एवं खोला पहाड़ियों को मिलाकर 2073 वर्ग किमी क्षेत्रफल को हस्तिनापुर वन्य जीव विहार के रूप में संरक्षित करने का निर्णय लिया गया था। धारा 18 ए के तहत वन विभाग ने सेंक्चुरी के अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी किया, लेकिन बीते 33 सालों में फाइनल नोटिफिकेशन नहीं किया गया। इसको लेकर एनजीटी में याचिका भी दायर की गई थी।
हस्तिनापुर अभयारण्य में मेरठ के साथ बिजनौर और अमरोहा जिले की सीमा लगती है। सरकार की ओर से अधिसूचना जारी नहीं होने के कारण अभयारण्य क्षेत्र का विकास नहीं हुआ। वन विभाग भी विकास एवं औद्योगिक गतिविधियों को रोकने में सख्ती नहीं कर पाता है। इन्हीं कारणों से बारहसिंघा समेत विभिन्न प्रजाति के हिरण और तेेंदुए खतरे में हैं।
भौगोलिक स्थिति को लेकर आ रही परेशानी
वन विभाग अधिकारियों के मुताबिक, हस्तिनापुर वन्यजीव अभयारण्य की भौगोलिक स्थिति को लेकर परेशानी है। इसके एक ओर शहर और उद्योग धंधे चल रहे हैं, दूसरी तरफ वन्यजीव अभ्यारण्य है। इनमें बहुत से 1986 से पहले के हैं। इस पूरे प्रकरण को लेकर वन विभाग की तरफ से गंगा किनारे और जंगली पशुओं की आवाजाही वाले स्थल तक का सर्वे कराकर सीमा का निर्धारण कराया गया।
वन विभाग और वाइल्ड लाइफ की तरफ से बारहसिंघा को लेकर सेंक्चुरी में सर्वे कराया गया था। इस सर्वे के मुताबिक बारहसिंघा का रहवास गंगा किनारे के अलावा उन इलाकों में भी मिला, जहां पर पास में आबादी है। ऐसे में समस्या यह है कि किस तरह से क्षेत्र को संरक्षित किया जाए।