सदियों से चली आ रही धारणाओं के पिंजरे में कैद थीं बेटियां। आंखों को सपने देखने की आजादी नहीं थी। रोशनी मानों उनसे रूठी थी। पीढ़ियां बदल गईं पर नजरिया नहीं। देश को तीन अर्जुन अवॉर्डी रेसलर देने वाले मलकपुर गांव की बेटियां दंगल और अन्य किसी भी खेल से दूर थीं। लेकिन तभी यहां की एक बेटी अंशू सभी रूढियों को तोड़ते हुए अखाड़े में उतरी और उसने गांव की रूढ़ियों को चित्त कर दिया...
अखाड़े में उतरते ही अंशू ने चित्त कर दी गांव की रूढ़ियां, जो कसते थे तंज आज तारीफ करते नहीं थकते
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बागपत के मलकपुर गांव के सुभाष पहलवान, राजीव तोमर और शोकेंद्र तोमर देश में रेसलिंग के प्रख्यात नाम हैं। तीनों को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। रेसलर अंशू तोमर ने यश भारती और रानी लक्ष्मीबाई अवॉर्ड प्राप्त कर नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं। 25 वर्षीय अंशू तोमर रेलवे में सीनियर क्लर्क हैं। वह लखनऊ में प्रक्टिस करती हैं। एक कमरा अंशू की उपलब्धियों से दमक रहा है। जिसमें मेडल और शील्ड की भरमार है। अंशू 76 किग्रा भार में रेसलिंग करती हैं।
अंशू के पिता किसान हैं। जब वह सातवीं में थीं तब सुभाष पहलवान ने उनके पिता से अंशू को कुश्ती सिखाने के लिए कहा। उन्होंने घर में ही कच्चा अखाड़ा बनाया। अंशू ने प्रैक्टिस शुरू की। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शुरुआत में गांव वाले परिवार पर तंज कसते थे पर पिता सतवीर सिंह ने सबको अनसुना कर दिया। अंशू ने दूध-घी खाकर कुश्ती की।
परिवार के संसाधन सीमित थे। 2006 में नेशनल खेला और सब जूनियर में गोल्ड मेडल जीता। एशियन चैंपियन शिप में कांस्य, वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। सीनियर में नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीता। अंशू नौ बार भारत केसरी और दो बार उप्र केसरी रह चुकी हैं। उन्हें 2013 यश भारती और 2016 में रानी लक्ष्मी बाई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
परिवार में बेटा-बेटी में कोई भेद नहीं
अंशू कहती हैं, मेरे पापा ने बेटा-बेटी में कोई भेद नहीं किया। उन्होंने सीमित संसाधनों में भी मुझे खिलाया। पहले गांव वाले ताने देते थे, अब तारीफ करते हैं। मुझे देखकर और लोगों ने भी अपनी बेटियों को स्पोर्ट्स में डाला। गांव में देवेंद्र खलीफा का अखाड़ा है।
पांच-छह लड़कियां वहां कुश्ती सीखने जाती हैं। दो बड़ौत स्टेडियम में सीखती हैं। आठ-दस कबड्डी खेल रही हैं। मैंने अपनी बहन और भाई को भी सपोर्ट किया। छोटी बहन आरजू जूनियर में दो बार गोल्ड ला चुकी है। भाई भी रेसलिंग करता है। मैं ओलंपिक खेलकर देश का नाम रोशन करना चाहती हूं। सुभाष पहलवान जी से सलाह लेती रहती हूं। लड़कियां लड़कों से कम नहीं है। उन्हें अवसर देने की जरूरत है।
जिनको मैंने सिखाया, वो मेडल ला रहीं
बागपत के धनौरा गांव की ऋतिका वेदवान की कहानी भी ऐसी है। गांव से तीरंदाजी में निकली वह पहली लड़की थीं। उनका भाई आर्चरी करता है। उसी ने ऋतिका को अपने साथ एकेडमी ले जाना शुरू किया। यहीं से उनका सफर शुरू हुआ। 24 वर्षीय ऋतिका नोएडा के गुरुकुल स्टेडियम में तीरंदाजी की कोच हैं। उन्होंने सीनियर नेशनल में एक गोल्ड और दो सिल्वर मेडल जीते हैं। ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में पांच साल चैंपियन रही हैं।
24 जनवरी 2019 को उन्हें लक्ष्मीबाई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। ऋतिका के पिता किसान हैं। गांव वाले उनके तीरंदाजी सीखने पर ताना मारते थे। बताती हैं, गांव से पहली खिलाड़ी मैं थी। मेरे बाद मधु और साक्षी वेदवान निकलीं। मधु इंटरनेशनल मेडलिस्ट हैं और साक्षी सीनियर नेशनल मेडलिस्ट। हमें देखने के बाद गांव की सोच बदली। अब लोग अपनी लड़कियों को पढ़ाते भी हैं और खिलाते भी। जिनको मैंने सिखाया, वो मेडल लेकर आईं। यह देखकर बहुत खुशी होती है।