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'रोटी के लिए जद्दोजहद करती हूं, मंदिर भी जाती हूं और मस्जिद भी', रसूलाबाद की रसूलन की कहानी

Sat, 05 May 2018 07:54 AM IST
अंकित त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर देहात
अंकित त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर देहात Updated Sat, 05 May 2018 07:54 AM IST
सार

- जन्म से दृष्टिहीन होने के बाद भी करती हैं सब काम
- आठ भाई-बहनों में पांच नहीं देख सकते

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Heart touching Story of Blind and Poor Rasoolan
दृष्टिहीन रसूलन  

विस्तार

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना, फिर हम क्यों भेदभाव करें। हम जितना खुदा को मानते हैं उतना भगवान को। मंदिर जाते हैं और मस्जिद भी। यह कहना है कानपुर देहात के रसूलाबाद कस्बे में रह रहीं जन्म से दृष्टिहीन 30 वर्षीय रसूलन का। कस्बे के मंदिर में रसूलन प्रतिदिन जाकर पूजापाठ करती है। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी कि दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। फिर भी वह निराश नहीं होती। 
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चार भाई भी जन्म से दृष्टिहीन

Heart touching Story of Blind and Poor Rasoolan
दृष्टिहीन रसूलन के भाई 
रसूलाबाद कस्बे के भीखदेव कहिंजरी गांव निवासी हफीज की आठ संतानों में सबसे बड़ी 30 वर्षीय बेटी रसूलन को जन्म से ही दिखाई नहीं देता। चार भाइयों गोरे, सब्बीर, चांद बाबू व अरमान भी जन्म से दृष्टिहीन हैं। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी कि उन्हें सुबह का भोजन मिल गया तो शाम का भरोसा नहीं कि मिलेगा भी या नहीं। लेकिन ईश्वर पर विश्वास में कमी नहीं आई। आंखों में रोशनी न होने के बाद भी निराशा नहीं हुई। रसूलन कहती है कि भगवान व खुदा में क्या फर्क सभी जानते हैं, लेकिन इसके बाद भी निजी स्वार्थ के लिए धर्म के नाम पर लोग नफरत घोल रहे हैं। सभी धर्मों को समान इज्जत देती हैं। चाहे रमजान हो या नवदुर्गा। रमजान में रोजा रखती हैं तो नवदुर्गा में मंदिर जाकर प्रसाद चढ़ाती हैं।
 
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शनिदेव मंदिर जाकर प्रसाद चढ़ाते हैं पिता हफीज

Heart touching Story of Blind and Poor Rasoolan
डेमो पिक
इनके पिता हफीज हर शनिवार को शनिदेव मंदिर जाकर प्रसाद चढ़ाते हैं। बताते हैं कि 25 साल पूर्व पुत्र गोरे के जन्म के दौरान उसकी हालत बहुत बिगड़ गई थी। डाक्टरों ने जवाब दे दिया था। तब पुत्र को पनकी मंदिर ले गया। वहां का प्रसाद खाने के बाद उसकी हालत में सुधार होने लगा। तभी से भगवान के प्रति आस्था बढ़ गई। प्रत्येक शनिवार को शनिदेव के मंदिर के साथ ही स्थानीय कालेश्वर मंदिर भी जाता हूं। 
 
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लालटेन चार्ज कर करती है गुजरबसर

Heart touching Story of Blind and Poor Rasoolan
डेमो पिक
गरीबों के उत्थान के लिए सरकार की तमाम कल्याण कारी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इसके बाद भी हाफिज का परिवार उन योजनाओं से महरूम है। हाफिज के 8 बच्चों सहित दस सदस्यीय परिवार आर्थिक तंगी में गुजर बसर कर रहा है। घर के पांच सदस्य दृष्टिहीन होने के बाद भी इन्हें सरकार की ओर से किसी भी योजना का लाभ नहीं दिया गया। हाफिज बताते हैं कि बच्चे जहां मांग कर काम चलाते हैं वहीं वह मजदूरी व पानी बेंचकर गुजर बसर कर रहे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए श्रमिक भारती संस्था ने आठ साल पूर्व रसूलन को लालटेन चार्जिंग के लिए पैनल दिया था। जिससे कुछ कमाई हो जाती थी, लेकिन धीरे धीरे वह खराब होने लगी। मौजूदा समय में रसूलन के पास 20 लालटेन हैं, जिससे वह प्रति माह एक हजार रुपये तक बचा लेती हैं।
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