दोस्तों पिछले दिनों हम आये रहन आपन गृह नगर कानपूर.. तो जइसेहे हम जाजमऊ क्रास किहेन तो जेके कॉलोनी के पास गाना बजत रहा आज रपट जायेव तो हमें ना उठायेव.. आगे बढे तो शिव कटरा नुक्कड़ पे डीजे पे गाना बजत रहा रिमझिम गिरे सावन.. सुलगि सुलगि जावे मन.. हम कहा यार ई सबै लोगे सावन अउर बारिश केर गाने बजाय रहे हैं.. हम तभीने समझ गे रहन कि ई कनपुरिये सावन केर गाना बजाय बजाय के मानसून जल्दी खींच लईहैं..
अउर फिर वही भा.. अगले दिन मंगलवार का खूब जम के पानी बरसा अउर ओला भी गिरे.. मगर हमरे समझ मा ई बात नाही आई कि इत्ती बारिस होय के बादौ गरमी कम होय के बजाय अउर बढ़ि गयी.. वइसे एक ठो बात अउर हमरे दिमाग मा कुलबुलाय रही है.. हम सबै कनपुरियों से पूछे चाहित है.. खास तौर पे आजाद नगर वासियन से.. काहे से कानपूर के आजाद नगर वासी जादा बुद्धिजीवी हैं कि अगर सब्जी मा पनीर ढूंढें से भी ना मिले तो का उई सब्जी का हम खोया पनीर कहि सकत हन?..
मतलब खोया भया पनीर.. वइसे खाय पिए के मामले मा आजकाल केर बच्चे बड़े सुखी आंय.. आजकाल अगर कौने केर बच्चे जिद करत हैं कि हम दाल सब्जी ना खइबै तो उनके माय बाप के पास उनका खवाय के लिए बहुत ऑप्शन हैं.. जइसे मैगी.. पास्ता.. पिज्जा.. चाऊमीन अउर ना जाने का का.. अउर भईया हमका आपन बचपन याद है.. जब हम आपन अम्मा से कहत रहन कि आज हम सब्जी ना खईबै.. तो हमरी अम्मा हमका सिरिफ दुई ऑप्शन देत रहीं कि सब्जी खइहौ या चप्पल?..
खैर अभीन परों टप्पा टुइयां रिमझिम बारिस होत रही तो हमरा मन भवा कि यार गरम गरम समोसा खावा जाय.. तो हम गुप्ता मिठाई वाले के हिंया गे समोसा ले.. गुप्ता केर नौकरवा चार समोसा लावा.. हम कहा दुई समोसा तुम लई लेव.. हिंया बईठ के खाय लेव.. तो उई गुस्साय गवा.. कहे लाग कि ई सब कूड़ा करकट बाहर की चीज तुमहिं खाव.. ई सुनि के हम ओका लाठी लई के दौड़ा लीन्हेन..
अभीन परसों संकठा का कुछ औरतें कूट दिहिन.. मॉल रोड पे कम्पनी बाग के नुक्कड़ पे संकठा चाय पियत रहैं.. तबहीं हुंवा मोटी मोटी कुछ महिलाएं कौनो मोर्चा आन्दोलन करत भयी निकलीं.. उई औरतें नारा लगावत रहीं आज की नारी सब पे भारी.. ई सुनि के संकठा कहि दीन कि तो इत्ता हौंक के काहे खाती हौ.. बस यही बात पे उई महिलाएं रिसियाय के संकठा की ठुकाई करि दिहिन..