बेहमई में बेरहमी: कानूनी दांवपेंच में 40 साल से उलझा हुआ है फैसला, 35 में सिर्फ सात आरोपी ही जिंदा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। हालांकि सुनवाई के लिए सारा रिकॉर्ड हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गया और फाइलें वापस सेशन कोर्ट आईं। इस कवायद में काफी समय बर्बाद हुआ। इसके बाद फूलन देवी की हत्या हो गई। धीरे-धीरे कई आरोपियों की मौत हो गई। तीन आरोपी भीखा, विश्वनाथ उर्फ पुतानी और श्यामबाबू जमानत पर हैं जबकि एक आरोपी फोसा जेल में है।
40 साल बाद भी तीन आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर
बेइमई कांड के बाद शुरुआती दौर में पुलिस ने काफी तेजी दिखाई। इसी का नतीजा था कि घटना के एक साल के भीतर ही सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट भेज दी गई थी। दूसरा पहलू यह भी रहा कि 40 साल बाद भी पुलिस तीन आरोपियों रामरतन, मानसिंह और अशोक उर्फ विश्वनाथ को गिरफ्तार नहीं कर सकी है।
शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल ने बताया कि 35-36 डकैत आरोपी बनाए गए थे। कानून के अनुसार मुकदमे में आरोप तय करने के लिए सभी आरोपियों का कोर्ट में हाजिर होना जरूरी होता है। कानून की इसी पेचीदगी का फायदा आरोपी उठाते रहे। हर तारीख पर कोई न कोई आरोपी गैर हाजिर हो जाता और आरोप तय नहीं हो पाते थे। 30 साल बाद वर्ष 2012 में आरोप तय हो सके।
तीन साल में पूरी हो गई थी गवाही
2012 में आरोप तय होने के बाद मुकदमे की कार्रवाई आगे बढ़ी और सिर्फ तीन में अभियोजन ने अपने 15 गवाहों के बयान कोर्ट में दर्ज कराकर गवाही खत्म करा दी। अभियुक्तों के बयान दर्ज होने के बाद बहस हुई और मुकदमा फैसले की दहलीज तक पहुंच गया लेकिन फिर कुछ कानूनी पेचीदगियों में फैसला उलझ गया।
शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि मुकदमे में तीन बार अंतिम बहस हो चुकी है लेकिन फैसला नहीं आ पा रहा। जब फैसले की घड़ी आती तो न्यायाधीश का स्थानांतरण हो जाता और कानून के अनुसार नए न्यायाधीश के आने पर दोबारा बहस सुनानी पड़ती है। दो माह तक लगातार चली बहस के बाद दिसंबर 2019 में फिर फैसला आने की उम्मीद थी लेकिन इस बार केस डायरी का पेंच फंस जाने के कारण फैसला अटक गया। केस डायरी मिल नहीं रही है।
जिले के पुराने मुकदमों में बेहमई कांड की फाइल को प्रथम वरीयता पर रखा गया है। अभियोजन ने सिर्फ तीन साल में गवाही पूरी करा दी। तीन बार कोर्ट में बहस भी सुनाई जा चुकी है। पुलिस फरार आरोपियों को ढूंढने के प्रयास कर रही है। कानूनी पेचीदगियों का लाभ आरोपियों को मिल रहा है। मुकदमे के जल्द निस्तारण के प्रयास किए जा रहे हैं। - राजू पोरवाल, शासकीय अधिवक्ता फौजदारी
मुकदमे के जल्द निस्तारण के लिए न तो सरकार ने कोई परवाह दिखाई और न ही न्यायिक कार्यवाही में ही तेजी आई। इसके चलते मुकदमा 40 साल से लंबित है। आरोपियों की ओर से न्यायिक कार्यवाही के संचालन में कोई हीलाहवाली नहीं की गई। खुद को निर्दोष साबित करने के लिए आरोपी सालों से न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं। - गिरीश नारायण दुबे, आरोपियों के अधिवक्ता