प्रयागराज में अमिताभ बच्चन के ‘दस द्वार वाला बंगला’ की खासियत जानकर चौंक जाएंगे आप
कोई भी शहर अपनी विभूतियों से ही पहचाना जाता है। कहीं जाने पर हम वहां की विभूतियों से जुड़ी जगहों को देखना नहीं भूलते। फिर उन जगहों को देखते, उन्हें याद करते हुए रोमांचित हो उठते हैं। विदेशों में तो ऐसी शख्सियतों के मकान किसी धरोहर की तरह संजोए गए हैं। लेकिन, अमिताभ की जन्मस्थली क्लाइव रोड वाला बंगला पर्यटन विभाग की नजर से ओझल है।
पर्यटक तो दूर, नई-पुरानी पीढ़ी के तमाम शहरी भी नहीं जानते कि क्लाइव रोड का सत्रह नंबर बंगला, अमिताभ की जन्मस्थली और हरिवंशराय बच्चन की कर्मस्थली भी है। नगर निगम के अधिशासी अभियंता भार्गव ने तकरीबन दस बीघे में यह बंगला बनवाया था। लेकिन उन्होंने बंगला महानिर्वाणी अखाड़े को बेच दिया। तब इसमें तेरह किराएदार रहते थे, जिनमें से हरिवंश राय बच्चन भी एक थे। तब बच्चन तीन कमरों के लिए सात रुपये किराया देते थे। वर्ष 1958 में नई दिल्ली रवाना होने से पहले वह तकरीबन आठ से नौ वर्षों तक यहां रहे।
कला-सिनेमा से जुड़ा कोई भी छोटा-बड़ा कलाकार जब भी यहां आया, उसने इलाहाबाद को अमिताभ बच्चन के शहर के तौर पर ही रेखांकित किया। ‘हाथी घूमै गांव-गांव, जेकर हाथी, वोकर नाम’ की तर्ज पर अमिताभ भले ही मुंबई के हो गए हैं लेकिन अपनी फिल्मों से लेकर इंटरव्यू, स्टेज प्रोग्राम सहित फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि पर वह आज भी इलाहाबाद की यादें सहेजना नहीं भूलते। बच्चन का आवास होने के कारण ही ‘दस द्वार वाला बंगला’ यह बंगला उन्हीं के नाम से मशहूर और क्लाइव रोड की शान हो गया। पांच दरवाजे, तीन खिड़कियों और दो रोशनदान यानी दस द्वार वाले कमरे के कारण ही यह ‘दस द्वार वाला बंगला’ कहलाया।
वास्तु के नियमों से बने इस बंगले का नाम ‘सूर्यभेदी भवन’ भी है क्योंकि इसके प्रत्येक कमरे में सूर्य की किरणें सीधे पड़ती हैं। मुख्य द्वार और पीछे का निकास दोनों एक ही सीध में हैं। बाहर लान, रोशनी के लिए लैंपपोस्ट, दोनों किनारे पर बाग और शानदार किचेन के अतिरिक्त बंगले में तीस कमरे हैं। पीछे की ओर खुला आंगन है जिसके दोनों ओर कमरे और छत पर जाने के लिए दोनों ओर सीढ़ियां हैं। फिलहाल यह बंगला ‘श्री शंकर इंदु तिवारी प्रसार न्यास’ की देखरेख में है।