सीता सचिव सहित दोउ भाई/ शृंगवेरपुर पहुंचे जाई/ अनुज सहित सिर जटा बनाए/ देखि सुमंत्र नयन जल छाए/ केवट कीन्ह बहुत सेवकाई/ सो जामिनि सिंगरौर गंवाई/ सई तीर बसि चले बिहाने...। तुलसी की राम चरित मानस की चौपाइयों के अलावा कालिदास के ‘रघुवंश’ में प्रभु श्रीराम व निषादराज की मिलनस्थली के रूप में उल्लिखित शृंगवेरपुर की भव्यता आज भी कम नहीं हुई है।
प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर से भगवान राम ने दिया था विश्व बंधुत्व का संदेश
मान्यता है कि भगवान पुत्र प्राप्ति की कामना से दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ को शृंगी ऋषि ने कभी इसी जगह कराया था। ऐसे में सनातनधर्मियों के लिए इस तीर्थ की महिमा अयोध्या से कम नहीं कही जा सकती। अब यहां निषादराज और राम के मिलन की प्रतिमा स्थापित करने की योजना है, ताकि पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।
गंगा तट पर स्थित यह तीर्थ श्रृंगी ऋषि और माता शांता की साधनास्थली के रूप में भी जाना जाता है। वाल्मीकि रामायण और अन्य ग्रंथों के मुताबिक दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए श्रृंगी ऋषि के आचार्यत्व में ही पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। तब प्रभुराम समेत चार पुत्रों की उन्हें प्राप्ति हुई थी। इसके बाद दशरथ ने श्रृंगी ऋषि से ही अपनी पुत्री शांता का विवाह भी किया था।
पर्यटन विभाग की ओर से कराए गए श्रृंगवेरपुर के ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक अध्ययन के अनुसार श्रृंगवेरपुर धाम से ही भगवान राम ने सीता व लक्ष्मण के साथ तपस्वी वेश में 14 वर्ष के वनवास के लिए प्रस्थान किया था। तब इसी जगह भगवान राम ने निषादराज का आतिथ्य स्वीकार करते हुए उन्हें गले लगाकर छुआछूत व भेदभाव मिटाकर सामाजिक एकता का संदेश भी दिया था। ऐसे कई तीर्थ प्रयागराज में विकास की बाट जोह रहे हैं। नागवासुकि तीर्थ भी उनमें से एक है।
भोगवती तीर्थ के रूप में नागवासुकि धाम की महिमा
दशाश्वमेध घाट के पास स्थित नागवासुकि धाम को भोगवती तीर्थ के रूप में जाना जाता है। पद्मपुराण के मुताबिक ब्रह्मा के कमंडल से निकलकर गंगा पृथ्वी लोक पर आने से पहले नागवासुकि के फन पर गिरी थीं। वर्ष 1739 में नागपुर के राजा रघुजी भोसले ने आक्रमण कर इस सूबे के प्रधान शासक शुजा खान को हराकर मार डाला था। तब मराठा राजा के पुरोहित श्रीधर ने जीर्ण शीर्ण रहे नागवासुकि मंदिर का नए सिरे से निर्माण कराया था।