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दीपांशु की कहानी: पिता बस कंडक्टर, मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता; पूरे चुनाव में नंगे पैर नजर आए डूसू के 'सिकंदर'

Sun, 20 Sep 2026 11:41 AM IST
Sharukh Khan अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Sharukh Khan Updated Sun, 20 Sep 2026 11:41 AM IST
सार

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में उपाध्यक्ष पद जीतने वाले दीपांशु शौकीन ने एनएसयूआई से टिकट नहीं मिलने पर नंगे पैर निर्दलीय उतरे और जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। करीब 16 साल बाद किसी निर्दलीय उम्मीदवार की जीत ने छात्र राजनीति में सबका ध्यान खींचा है। इससे पहले 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार मनोज चौधरी ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी।

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DUSU Election Results 2026 Deepanshu Shaukeen entered fray as an independent candidate, campaigning barefoot
DUSU Election Results - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में दीपांशु शौकीन अपने अनोखे प्रचार अभियान के कारण चर्चा में रहे। छात्रों के बीच वोट मांगने के दौरान वह पूरे चुनाव प्रचार में नंगे पैर नजर आए। सत्य निकेतन में हुए पीजी हादसे के बाद छात्रों के मुद्दों को लेकर उन्होंने संकल्प लिया था कि न्याय मिलने तक जूते-चप्पल नहीं पहनेंगे। चुनावी मैदान में उतरने के बाद भी उन्होंने अपना संकल्प कायम रखा। मतगणना केंद्र पर भी वह नंगे पैर ही पहुंचे।
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निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने वाले दीपांशु ने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। करीब 16 साल बाद किसी निर्दलीय उम्मीदवार की जीत ने छात्र राजनीति में सबका ध्यान खींचा है। इससे पहले 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार मनोज चौधरी ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी। उन्हें एबीवीपी का समर्थन प्राप्त था।
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दीपांशु मूल रूप से दिल्ली के पीरागढ़ी गांव के रहने वाले हैं। वह पहले एनएसयूआई से जुड़े थे और संगठन से उपाध्यक्ष पद के टिकट की उम्मीद कर रहे थे। उन्होंने नामांकन भी दाखिल किया था। बाद में नामांकन वापस लेने को कहा गया, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 
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इसके बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। प्रचार के दौरान उन्होंने कैंपस में नंगे पैर घूमकर छात्रों से संपर्क किया और अपने मुद्दों व संकल्प को उनके सामने रखा। चुनाव में उनका मुकाबला एबीवीपी, एनएसयूआई और अन्य उम्मीदवारों से हुआ।

पिता बस कंडक्टर, मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता
दीपांशु ने भगत सिंह कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की है। फिलहाल वह दिल्ली विश्वविद्यालय में बुद्धिस्ट स्टडीज की पढ़ाई कर रहे हैं। उनके पिता बस कंडक्टर और मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं।

बदली युवा राजनीति का पहला बड़ा चुनावी संदेश
बमुश्किल डेढ़ महीने के भीतर दिल्ली में युवा राजनीति की दो तस्वीरें सामने आईं, जो पहली नजर में एक-दूसरे से बिल्कुल उलट दिखती हैं। जुलाई में परीक्षा, शिक्षा, रोजगार और जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं ने जंतर-मंतर पर सड़क को अपना मंच बनाया था। तब सवाल व्यवस्था और सत्ता से सीधे पूछे जा रहे थे। 

 

इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में वही युवा कैंपस की चुनावी राजनीति का हिस्सा बने तो राजनीतिक अभिव्यक्ति का रुख बदलता दिखा। चेहरे और सोशल मीडिया की भूमिका भले समान रहे, लेकिन राजनीतिक मंच अलग था।

राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव को भाजपा नेतृत्व की उस रणनीति से जोड़कर देखते हैं, जिसमें बदलती सामाजिक परिस्थितियों और नई पीढ़ी के मुद्दों को जल्दी पहचानकर उसके अनुरूप राजनीतिक संवाद तैयार किया जाता है। 

जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उठे सवालों को सत्ता के शीर्ष स्तर तक पहुंचने और युवाओं के साथ संवाद की जरूरत पर जोर दिए जाने के बाद भाजपा और सरकार के बयानों व कार्यक्रमों में जेन-जी को संबोधित करने की कोशिश लगातार दिखाई दी। डूसू चुनाव को इसी बदले संवाद की संस्थागत परीक्षा के तौर पर भी देखा गया। चुनाव परिणाम में एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और सहसचिव के तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की।

एनएसयूआई के तीन बागी मैदान में
कांग्रेस और एनएसयूआई जंतर-मंतर के बाद बने माहौल को चुनावी स्तर पर अपने पक्ष में नहीं बदल सके। टिकट वितरण को लेकर एनएसयूआई में असंतोष सामने आया और तीन बागी उम्मीदवार मैदान में उतरे। इनमें से एक ने उपाध्यक्ष पद जीत लिया। नतीजतन डूसू में एनएसयूआई का प्रदर्शन इस बार शून्य पर रहा, जबकि उपाध्यक्ष पद बागी उम्मीदवार के खाते में गया।

 

सीख लेकर बदली रणनीति
मेरे लिए जंतर-मंतर आंदोलन और डूसू चुनाव को साथ रखकर देखने पर सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस संगठन ने कितनी सीटें जीतीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सड़क से उठी नई पीढ़ी की आवाज को किसने कितनी जल्दी पढ़ा और अपनी राजनीति में जगह दी। भाजपा-एबीवीपी की कामयाबी को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। सड़क पर नई परिस्थिति पैदा हुई तो शीर्ष नेतृत्व ने उससे सीखते हुए अपनी रणनीति बदली। एबीवीपी ने मजबूत संगठन, वैचारिक आधार, अनुशासन और मुद्दों पर स्पष्टता के साथ खुद को बदली परिस्थितियों के अनुरूप ढाला और उसका परिणाम चुनावी जीत के रूप में सामने आया।- प्रो. चंद्रचूड़ सिंह, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

 

डूसू चुनाव में फिर भगवा लहराया
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा। वर्ष 2025 के चुनाव परिणाम को दोहराते हुए एबीवीपी ने चार में से तीन प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। अध्यक्ष पद पर यश डबास, सचिव पद पर रिया छाबड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्यराज सिंह ने जीत दर्ज कर तीनों पद एबीवीपी के खाते में डाल दिए, जबकि एनएसयूआई इस बार एक भी सीट नहीं जीत सकी। उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे दीपांशु शौकीन ने बड़ी जीत दर्ज की। डूसू में 17 साल बाद किसी निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई है।

अध्यक्ष : यश डबास को मीणा ने दी कड़ी टक्कर
हॉस्टल, सुरक्षित आवास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों के बीच हुए चुनाव में अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के यश डबास ने एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 2,053 मतों के अंतर से हराया। यश डबास को 24,576, जबकि विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। शुरुआत में दोनों के बीच कड़ा मुकाबला रहा। कई चरणों में दोनों उम्मीदवारों के बीच अंतर बेहद कम रहा, जिससे मुकाबला आखिरी दौर तक रोमांचक बना रहा। हालांकि, बाद के चरणों में एबीवीपी ने बढ़त मजबूत कर ली। गौरतलब है कि पिछले 16 वर्षों में 11 बार एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर कब्जा किया है।

 

उपाध्यक्ष : निर्दलीय शौकीन की एकतरफा जीत
उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने एकतरफा जीत दर्ज की। उन्होंने एबीवीपी के ईशू मौर्या को 13,705 मतों के बड़े अंतर से हराया। शुरुआत से ही दीपांशु की बढ़त मजबूत रही। एनएसयूआई ने इस सीट पर वीर चतरथ को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन उन्हें 4,313 वोट ही मिले। यह संख्या नोटा को मिले 4,359 वोट से भी कम रही। 17 साल बाद किसी निर्दलीय को जीत मिली है। वर्ष 2009 में एबीवीपी समर्थित मनोज चौधरी ने अध्यक्ष पद जीता था।

सचिव : छाबड़ी एनएसयूआई की नम्रता पर पड़ीं भारी
सचिव पद पर एबीवीपी की रिया छाबड़ी ने एनएसयूआई की नम्रता चौधरी को 6,789 मतों से पराजित किया। रिया को 21,650 और नम्रता को 14,869 वोट मिले। दोनों संगठनों ने इस पद पर महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।
 

संयुक्त सचिव : लक्ष्यराज को सपा के छात्र संगठन ने दी मजबूत टक्कर
संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी के लक्ष्यराज सिंह ने समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन के उम्मीदवार विशेष यादव को 827 मतों से हराया। लक्ष्यराज को 16,615, जबकि विशेष यादव को 15,778 वोट मिले। विशेष यादव एनएसयूआई से टिकट की मांग कर रहे थे।

13वें राउंड के बाद एबीवीपी ने बढ़त बनाई
मतगणना शनिवार सुबह आठ बजे निर्धारित समय पर शुरू हुई। कुल 20 राउंड की गणना के बाद शाम करीब चार बजे परिणाम घोषित किए गए। शुरुआती रुझानों में अध्यक्ष पद पर एनएसयूआई और एबीवीपी के बीच कड़ा मुकाबला रहा। कई राउंड में दोनों के बीच अंतर बेहद कम रहा। 13वें राउंड के बाद एबीवीपी ने बढ़त बनानी शुरू की और 17वें राउंड के बाद यश डबास की जीत लगभग तय हो गई।

 

23,942 मत मिले नोटा को, आइसा और एसएफआई के चारों उम्मीदवारों से ज्यादा
इस चुनाव में नोटा को भी बड़ी संख्या में वोट मिले। नोटा को कुल 23,942 मत मिले, जबकि आइसा और एसएफआई के चारों उम्मीदवारों को मिलाकर 22,331 वोट ही प्राप्त हुए।
 
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