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हाईकोर्ट ने बंद कमरे में हुई घटना में एससी-एसटी एक्ट की धारा रद्द की

Mon, 24 Feb 2020 09:00 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 24 Feb 2020 09:00 PM IST
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High court revokes SC-ST Act section in closed-door incident
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई मामला तभी बनता है, जब कि वह पब्लिक व्यू (ऐसी जगह हुई हो जहां अन्य लोगों ने भी उसे देखा हो) में हुई हो। बंद कमरे में घटी घटना जहां उसे देखना वाला कोई अन्य व्यक्ति नहीं था, पब्लिक व्यू के दायरे में नहीं आएगी। इस स्थिति मेें एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला नहीं बनेगा। सोनभद्र के केपी ठाकुर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति आरके गौतम ने दिया है।



 याची के अधिवक्ता सुनील कुमार त्रिपाठी का कहना था कि याची केपी कुमार खनन विभाग में अधिकारी हैं। याची विभाग के कर्मचारी विनोद कुमार तनया के खिलाफ चल रही विभागीय कार्यवाही में जांच अधिकारी हैं।

High court revokes SC-ST Act section in closed-door incident
SC/ST Act

याची ने जांच के सिलसिले में विनोद कुमार को अपने कार्यालय में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए बुलाया था। विनोद अपने साथ सहकर्मी एमपी तिवारी को लिवा करके गया तो याची ने एमपी तिवारी को जांच में हस्तक्षेप न करने का निर्देश देते हुए अपने चैंबर से बाहर कर दिया। इसके बाद विनोद कुमार ने याची के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में 156(3) के तहत शिकायत दर्ज कराई कि याची ने उसे अपने चैंबर में मारापीटा और जातिसूचक गालियां दीं। मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता और अन्य साक्षियों का बयान दर्ज करने के बाद याची के खिलाफ मारपीट, जान से मारने की धमकी, गाली देने तथा एससी-एसटी एक्ट की धारा में परिवाद कायम कर लिया है। 

High court revokes SC-ST Act section in closed-door incident
court of inquiry - फोटो : court of inquiry
अधिवक्ता का कहना था कि शिकायतकर्ता जांच में व्यवधान पैदा करने का आदी है और इस नियत से उसने याची के खिलाफ परिवाद दर्ज कराया है।  जिस समय घटना हुई, उस समय याची का चैंबर भीतर से बंद था और उसके अंदर कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो इस घटना का साक्षी रहा हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि घटना पब्लिक व्यू में नहीं है तो एससी-एसटी एक्ट की धारा नहीं बनती है।

कोर्ट ने कहा कि घटना के समय चैंबर भीतर से बंद था। इस घटना का कोई पब्लिक व्यू नहीं है। मजिस्ट्रेट द्वारा एकत्र साक्ष्य से भी पब्लिक व्यू साबित नहीं हो रहा है। इस स्थिति में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला नहीं बनता है। मजिस्ट्रेट का इन परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सम्मन आदेश जारी करना चाहिए था, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। कोर्ट ने याची के विरुद्ध लगाई गई एससी-एसटी एक्ट की धारा को रद्द करते हुए मारपीट, जान से मारने की धमकी व अन्य धाराओं में के तहत कार्रवाई जारी रखने का निर्देश दिया है। 
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