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जुबां छिपाती है बेटों की करतूत, आंखें बयां करती हैं दर्द, पढ़िए बेघर हुए बुजुर्गों की दुखभरी कहानी

Tue, 14 Jul 2020 12:47 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Tue, 14 Jul 2020 12:47 PM IST
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painful story of old parents who live in old age home ramlal ashram in agra
वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्ग - फोटो : अमर उजाला

'मैं अपने बेटों का नाम नहीं लूंगा, वरना वो बदनाम हो जाएंगे...। आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे देवी सिंह बेटों का अहित होने की आशंका पर पीड़ा से भर जाते हैं। बेटों ने घर से निकाल दिया...लेकिन काफी कुरेदने पर भी उनका नाम नहीं लिया। रामबेटी बोलीं, बच्चों ने बुरा किया लेकिन... हैं तो वो अपने ही। मन का दर्द दोनों की आंखों से झलक पड़ता है।



आश्रम में रह रहे 200 से अधिक लोगों की नजर मुख्य द्वार पर ही लगी रहती है कि बच्चे उनको लेने आएंगे। इन दिनों ऐसा इसलिए ज्यादा हो रहा है क्योंकि लॉकडाउन से अनलॉक-2 के बीच 11 लोगों को उनके बच्चे आश्रम से घर ले जा चुके हैं। अगली स्लाइड्स में पढ़िए वृद्धाश्रम में रह रहे बूढ़े मां-बाप की दुखभरी कहानी...

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जल निगम से रिटायर हुए देवी सिंह - फोटो : अमर उजाला

'यह बेघर होने से अच्छा है'

वर्ष 2017 में जल निगम से रिटायर हुए देवी सिंह अनलॉक-1 में जब आश्रम पहुंचे, तो काफी टूटे हुए थे। वो गढ़ी भदौरिया में रहते थे। बेटों के बारे में पूछा तो हाथ जोड़कर बोले- मैं अपनी दर्द भरी दास्तां में बेटों का नाम नहीं लूंगा, वो बदनाम हो जाएंगे। हालांकि बातों के दौरान दर्द होठों पर आ गया। बोले, बेटों ने कई बार उनकी पिटाई लगाने की कोशिश भी की। यहां हूं...ये बेघर होने से तो अच्छा है। इसके बाद....शून्य में ताकते रहे और चुप्पी साध गए।

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फतेहपुर सीकरी की रामबेटी - फोटो : अमर उजाला
'कोई बेटा नहीं दे ऐसी सजा'

10 महीने से आश्रम में रह रहीं फतेहपुर सीकरी की रामबेटी ईश्वर से हर पल मुक्ति की प्रार्थना करती हैं। बोलीं कि हर रोज यही कहती हूं कि दो मुठ्ठी राख होकर यमुना में ही मिल जाऊं। अगर किसी मां से कोई बड़ी गलती भी हो जाए, तो उनका बेटा उन्हें वो सजा नहीं दे, जो उन्हें आज मिल रही है। रामबेटी के दो बेटे हैं।
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लक्ष्मी - फोटो : अमर उजाला
'आंसुओं ने बयां किया दर्द'

रामलाल वृद्ध आश्रम में चार साल से रह रहीं लक्ष्मी की आंखों में अपनों के साथ नहीं होने का दर्द साफ झलक रहा था। काफी मुश्किल से बात करने के लिए तैयार हुईं। बोलीं कि आश्रम के कमरे में बैठकर बच्चों का बचपन याद कर मुस्कुरा लेती हूं। फिर आज की हकीकत को सामने देख डर लगने लगता है। आंखों में भर आए आंसू पोंछकर कहा कि बेटे उनकी पिटाई करते थे। लेकिन आज भी उनके आने का इंतजार है।
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मां से गले मिल फफक पड़ी बेटी - फोटो : अमर उजाला
'दो साल बाद मां से मिली बेटी दौड़कर गले से लिपटी, रो पड़ी'

दो साल से अपनी मां की तलाश में भटक रही चंचल ने गुरुवार को रामलाल वृद्ध आश्रम में मां लक्ष्मी देवी उर्फ कल्पना देवी को देखा, तो उनको जैसे खुशियों का संसार मिल गया। मां को सामने देख तेजी से भागी और लिपटकर रोने लगीं। बेटा बंटी भी साथ आया था। उन्होंने बताया कि ग्राम सोनिगा, थाना खंदौली की रहने वाली कल्पना देवी को सात दिन पहले उनके जेठ के बेटे सुखवीर ने आश्रम में देखा था। मां मानसिक रूप से बीमार रहती हैं। वह घर से चली गई थीं। 
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