1965 युद्ध: 'सिर्फ गुड़ चने खाकर दुश्मन को किया नेस्तानाबूद'
न भूख की परवाह और न दुश्मन की गोली का खौफ। 1965 में भूखे-प्यासे रहकर भी सीमा पर डटे सैनिकों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। सीमा से सटे लोगों की ओर से दिए गए गुड़ और चने से सैनिकों ने गुजारा किया। अंधेरे में लड़ाई लड़ना आसान नहीं था। आग जलाने की अनुमति नहीं थी। रिपोर्ट: शशिभूषण पुरोहित (ऊना) मंगल ठाकुर, नीरज महाजन, बरठीं/भराड़ी (बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश)
1965 युद्ध: 'सिर्फ गुड़ चने खाकर दुश्मन को किया नेस्तानाबूद'
18 दिन तक सीमा पर डटकर भारत ने दुश्मनों की ईंट से ईंट बजा डाली। 1965 के भारत-पाक युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर युद्धवीरों ने अमर उजाला के साथ युद्ध के अनुभव साझा किए। छंदोह गांव के मेहर सिंह ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई। वे कहते हैं कि 1965 में वह श्रीनगर में तैनात थे।इस दौरान सेना तक रसद पहुंचाने की ड्यूटी उनके पास थी। लड़ाई के दौरान सेना को खाने के लिए लोग चने और गुड़ देते थे। खुद गुड़-चने खाकर उन्होंने सेना तक खाद्य सामग्री पहुंचाई। जवान कई दिन तक भूखे लड़ते रहे।
1965 युद्ध: 'सिर्फ गुड़ चने खाकर दुश्मन को किया नेस्तानाबूद'
1963 में आर्म्ड कोर में भर्ती हुए बड़गांव के जगदीश चंदेल ने कहा कि उन्होंने 1965 में सियालकोट में लड़ाई लड़ी। उस समय उनके पास 7.62 एसएलआर थी। वे कहते हैं कि सेना के लिए खाद्य सामग्री तो पहुंचती थी, लड़ाई के चलते खाने का वक्त नहीं मिलता था। छत निवासी कैप्टन मुकद्म सिंह जंबाल ने बताया कि उन्होंने पाक बार्डर पर चार दिन भूखे रहकर लड़ाई लडी। बर्फ में यह काम आसान नहीं था।
1965 युद्ध: 'सिर्फ गुड़ चने खाकर दुश्मन को किया नेस्तानाबूद'
बडगांव निवासी सूबेदार हरी सिंह ठाकुर ने बताया कि खाने तक का वक्त नहीं मिलता था।
1965 युद्ध: 'सिर्फ गुड़ चने खाकर दुश्मन को किया नेस्तानाबूद'
बलोह निवासी सूबेदार प्यार सिंह तथा सूबेदार बिशन सिंह ने बताया कि 1962 में सेना में भर्ती हुए थे। 1965 में पश्चिमी बंगाल कृष्णानगर में तैनात थे। उन्होंने बताया कि उस वक्त युद्ध कर रहे सैनिकों तक तमाम सहायता पहुंचाने की जिम्मेदारी थी। कई दिन पैदल चलकर सामान उन तक पहुंचाया गया।