भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम समझौते के बाद सीमावर्ती इलाकों में लोगों की जिंदगी में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा है। शांति बहाल होने के साथ ही सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है। जो इलाके पाकिस्तानी गोलाबारी और बीएसएफ की जवाबी कार्रवाई से दहल उठते थे, वहां 24 फरवरी के बाद शांति है। सीमावर्ती लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि गोलाबारी की आवाज फिर कभी सुनाई न दे। बदले माहौल में किसान तारबंदी के नजदीक तक खेतों में आ जा रहे हैं। पहले उन्हें तय समय में ही इन खेतों में जाना होता था। वहीं, शाम ढलने तक हर हाल में घर लौटना पड़ता था।
संघर्षविराम समझौते से बदली लोगों की जिंदगीः देखिए बॉर्डर से सटे इन इलाकों की तस्वीर
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लोगों का कहना है कि दशकों बाद एक-दूसरे के घर के आंगन में बैठकर दुख सुख साझा करना नसीब हुआ है। बच्चे भी बेखौफ होकर गली-मोहल्ले और स्कूल में खेलने लगे हैं। गोलाबारी बंद होने से बच्चे तनाव मुक्त होकर पढ़ाई कर पा रहे हैं, जबकि पहले शाम ढलते ही उनकी धड़कनें तेज हो जाती थीं। अगर पाकिस्तान समझौते पर कायम रहा, तो सीमा के दोनों तरफ के लोगों की जिंदगी में कई बदलाव होंगे। अब यही कामना है कि हमेशा इसी तरह का माहौल बना रहे। समझौते के चलते सीमा पर चल रहे सुरक्षा बांध बनाने का कार्य भी तेज गति से हो रहा है। दिन रात यहां मशीनें काम कर रही हैं।
हीरानगर सेक्टर में तारबंदी के आगे करीब 10247 कनाल जमीन पर दशकों से खेती नहीं ही पाई है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि यह जमीन आबाद होगी। हालांकि, किसानों का कहना है कि पाकिस्तान पर इतनी जल्दी भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ समय देखने के बाद ही तारबंदी के आगे के खेतों में जाना सही होगा। बीएसएफ ने पहले भी कई बार किसानों को तारबंदी के आगे खेती करने को कहा। यही नहीं मानियारी में पिछले साल प्रशासन ने बीएसएफ के सहयोग से तारबंदी के आगे 13 सौ कनाल जमीन पर गेंहू बोई, ताकि यहां किसानों को खेती करने के लिए आकर्षित किया जा सके।
सीजफायर समझौते के बाद भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के जवान पूरी तरह से मुस्तैद हैं। पहले भी पाकिस्तान इस तरह के समझौते का उल्लंघन कर चुका है। इसलिए उस पर भरोसा करना आसान नहीं है। बीएसएफ की ओर से तारबंदी के पास उसी तरह से आज भी गश्त की जा रही है, जैसे सीजफायर समझौते से पहले की जाती थी। सीमा पार की हर गतिविधि पर बीएसएफ के जवान पैनी नजर बनाए हुए हैं।
आईबी से मात्र कुछ दूरी पर लडवाल स्कूल में जो बच्चे पहले बंद कमरों में बैठकर पढ़ते थे। अब शांत माहौल में पढ़ाई कर रहे हैं और खेल मैदान में धमाल भी मचा रहे हैं। पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली मन्नू शर्मा ने कहा कि गोलाबारी के दौरान डर लगता था कि न जाने कब गोला स्कूल में गिर जाए। जब कभी गोलाबारी तेज हो जाती थी तो हम कई दिनों तक स्कूल भी नहीं आ पाते थे। स्कूल के शिक्षक कुलदीप राज ने बताया कि गोलाबारी के दौरान बच्चे सहम जाते थे। कई बार हम इनके परिवार वालों को कहते थे कि छोटे बच्चों को माहौल शांत होने तक स्कूल न भेजें। अब उम्मीद है कि स्कूल में बच्चों की संख्या भी बढ़ेगी।