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Gorakhpur News: गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट समाप्त, साहित्य, संगीत और पत्रकारिता के विविध आयामों हुआ विमर्श

Mon, 09 Jan 2023 11:33 AM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 09 Jan 2023 11:33 AM IST
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Gorakhpur Literary Fest ends various dimensions of literature music and journalism discussed
गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट - फोटो : अमर उजाला।

गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन रविवार को कई सत्रों में पत्रकारिता और साहित्य पर मंथन किया गया। अपने-अपने क्षेत्र के माहिर लेखकों, पत्रकारों और साहित्यकारों ने विचार रखे। पत्रकार ऋचा अनिरुद्ध ने आज की पत्रकारिता को लट्ठमार बताया, तो लेखिका गीताश्री ने लेखक को महबूब और पाठक को खुदा। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि कला और साहित्य किसी पुरस्कार से श्रेष्ठ नहीं बनता। वहीं, साहित्यकार यतींद्र मिश्र ने कहा कि घरानों के संगीत खुद में साहित्य से पूर्ण होते हैं। साहित्यकार जयंती रंगनाथन ने कहा कि आज भी पाठकों का एक वर्ग है, जो किताबें पढ़ता है और खरीदकर पढ़ता है। शहर के युवा कवियों ने अपनी रचनाएं सुनाकर वाहवाही लूटीं। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता पर विचार व्यक्त किए।




 

Gorakhpur Literary Fest ends various dimensions of literature music and journalism discussed
मालिनी अवस्थी। - फोटो : अमर उजाला।
पुरस्कार नहीं होते कला-साहित्य के श्रेष्ठ होने के मानक : मालिनी अवस्थी
लोक गायिका एवं पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल में संगीत का साहित्य विषयक सत्र में कहा कि भारत के परिप्रेक्ष्य में कलाकारों की अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के आधार पर तुलना करना ठीक नहीं है। कोई भी पुरस्कार कला व साहित्य के श्रेष्ठ होने के मानक नहीं होते हैं।

गोरखपुर से अपने जुड़ाव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गोरखपुर की सरजमी बेजोड़ रत्नों और खजानों से भरपूर है। प्रेमचंद, फिराक और कबीर की धरती पर निर्गुण की परंपरा ने साहित्य की गंभीरता के साथ-साथ संगीत की गंभीरता को बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि भाव, राग और ताल से मिलकर भारत बना है।

वहीं, साहित्यकार यतींद्र मिश्र ने कहा कि घरानों के संगीत खुद में साहित्य से पूर्ण होते हैं। हर गीत का अपना विशेष प्रतिपाद्य है। संगीत के साहित्य को बिना गहराई से समझे उसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हर संगीत किसी उद्देश्य या मनोभाव की अभिव्यक्ति होती है। सत्र में मॉडरेटर की भूमिका मीनू खरे ने निभाई। सत्र का संचालन आशीष श्रीवास्तव ने किया।

 
Gorakhpur Literary Fest ends various dimensions of literature music and journalism discussed
ऋचा अनिरुद्ध - फोटो : अमर उजाला।

अरे बोलल अंगवना में कागा, पिया बिदेसवा से आ जा...
कार्यक्रम के दौरान मालिनी अवस्थी ने लोक गीतों की कुछ लाइनों को भी दर्शकों को सुनाकर वाहवाही लूटी। इस दौरान, अरे बोलल अंगनवा में कागा, पिया बिदेसवा से आ जा..., काहे को ब्याही विदेस, गंगा रेती पे बंगला दिवा दा मोरे राजा, रेलिया बैरन पिया को लेई जाये रे, गीतों के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

जो जनता पसंद करती है मीडिया वही दिखा रहा : ऋचा अनिरुद्ध
पत्रकार एवं लेखिका ऋचा अनिरुद्ध का कहना है कि आजकल की पत्रकारिता लट्ठमार हो गई है। इसके लिए जिम्मेदार मीडिया नहीं, बल्कि हम खुद भी हैं। मीडिया चैनल वही दिखा रहे, जो हम देखना चाह रहे हैं। हम गलत देखना बंद करें तो अच्छी खबरें और अच्छे शो अपने आप हमारे सामने होंगे।

गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन रविवार को शब्द संवाद सत्र में प्रकृति त्रिपाठी के साथ बातचीत में ऋचा ने कहा कि खराब खबरों को टीआरपी लोग दे रहे हैं। उड़ने वाली खबरों को लोग शौक से देखते हैं। सच्ची खबरें देखना लोगों को पसंद नहीं है। जो जनता को पसंद है मीडिया वही दिखा रहा है।

जिंदगी लाइव विद ऋचा और बिग हीरोज जैसे शो से प्रसिद्ध होने वाली ऋचा अनिरुद्ध ने बताया कि मां का हमेशा से सपना कुछ बड़ा करने का रहा। उन्होंने सिखाया कि कुछ भी करो तो बड़ा करो, शायद उसका प्रभाव रहा कि उन्होंने अमिताभ बच्चन से मिलने से इन्कार कर दिया था और तय किया कि जब भी मिलूंगी उनके इंटरव्यू के साथ मिलूंगी। इस अवसर पर ऋचा अनिरुद्ध ने साहित्य प्रेमियों के सवालों के जवाब भी दिए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियंका श्रीवास्तव ने किया।


 

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Gorakhpur Literary Fest ends various dimensions of literature music and journalism discussed
लेखिका गीताश्री - फोटो : अमर उजाला।

लेखक महबूब और पाठक खुदा : गीताश्री
लेखिका गीताश्री का कहना है कि आज के समाज को पशुता से बचाकर मनुष्यता की ओर ले जाना है। साहित्य के सृजन में सबसे अधिक चुनौती सर्जक के सामने होती है। लेखक तो मर जाता है, लेकिन वह पाठकों की स्मृति में जिंदा रहता है। लेखक महबूब और पाठक खुदा है। गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के तीसरे सत्र में रविवार को ‘समय और साहित्य’ विषयक चर्चा में विशाल पांडेय ने लेखिका गीताश्री और वरिष्ठ साहित्यकार जयंती रंगनाथन के साथ वार्ता की।

 

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साहित्यकार जयंती रंगनाथन - फोटो : अमर उजाला।

मुफलिसी साहित्य का मुकद्दर न तय करे, इसकी जिम्मेदारी हम सब पर: जयंती रंगनाथन
साहित्यकार जयंती रंगनाथन ने कहा कि मुफलिसी साहित्य का मुकद्दर न तय करे इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है। यह भ्रम है कि किताबों का जादू खत्म हो गया है। आज भी पाठकों का एक वर्ग है जो किताबें पढ़ता है और खरीदकर पढ़ता है। महामारी के दौर में अखबारों के न आने की चिंता भी लगभग दूर हो गई। पाठक वर्ग ने दोबारा से हिंदी लेखन के बाजार को जागृत किया है।

उन्होंने कहा कि प्रकाशक पहले की तुलना में आज बढ़े हैं। लिखने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। साहित्य में लेखन खुशी के लिए तो हो, पर वह मुफ्त में न हो। हम केवल रोजी-रोटी करने नहीं, बल्कि अपने आनंद के लिए भी लिखते हैं, लेकिन साहित्य के लिए वास्तव में समर्पण की जरूरत है। सत्र का मॉडरेशन विशाल पांडेय तथा संचालन डॉ. चारुशीला शाही ने किया।

 

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