अमर उजाला ग्राउंड रिपोर्ट: जिन सड़कों पर कभी दौड़ा करती थीं गाड़ियां, वहां अब भूख रेंगती नजर आती है
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जो रो कर सोया था भूख के मारे
वो बच्चा...नींद में मुस्कुरा रहा था
अजीब सी रौनक थी उस चेहरे पर
शायद सपनों में कुछ खा रहा था...
ये कहानी भूख की है और ये भूख से शुरू होकर भूख पर ही खत्म हो जाएगी। लेकिन इसके बारे में आपको जानकारी देना जरूरी है, क्योंकि उम्मीद है कि कुछ अच्छे प्रयासों से चंद निवालों का भी प्रबंध हो गया तो मेहनत सफल हो जाएगी। देश में इस समय हर ओर जिंदगी से जंग चल रही है। तमाम सरकारी घोषणाओं और दावों के बीच सच ये है कि सड़कों पर बेचारगी और लाचारी के दृश्य दिखाई दे रहे हैं। जो गरीब दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में परदेस गया था, अब सड़कों पर मारा-मारा फिर रहा है। उसकी कोशिश है कि बस किसी तरह अपने घर पहुंच जाए, अपनों के बीच पहुंच जाए। किसी तरह उस आशियाने तक पहुंच जाए जिसे छोड़कर कभी परदेस का रुख कर लिया था।
गरीब मजदूरों को इस बीमारी ने कुछ तरह से अपनी चपेट में ले लिया है कि शायद लाचारी भी लाचार महसूस करने लगी है। अब इसने पांव में छालों, पैर से बहते खून, सड़क पर बिखरी रोटियों और बच्चों की रोने की आवाज का रूप धारण कर लिया है। कहीं गर्भवती महिलाएं का मीलों लंबा सफर तो कहीं ऑटो में घुटने मोड़कर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करते लोग। कुछ अभागे तो ऐसे कि बीच सफर में ही दम तोड़ दिया। वायरस ने तो नहीं मारा, भूख और प्यास ने मार दिया। हर कहानी में एक दर्द है। प्रवासी मजदूर आखिर किस पीड़ा का सामना कर रहे हैं, इस पर अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट-
लखनऊ: तपती सड़क और सिर पर गठरियां लादकर बस चले जा रही हैं गर्भवती महिलाएं
वो चले जा रहे हैं...। ट्रकों में ठुंसे हुए। साइकिल पर पोटलियां समेटे...। थोड़ी सी जो जगह बची उस पर बच्चों को बिठाए।... और पैदल भी। सिर पर गठरियां लदी हुईं। यही तो कुल जमा जिंदगी की कमाई है। इनमें मां हैं। तो गर्भवती महिलाएं भी। पर, सब तपती सड़क को नापे जा रहे हैं। पारा 38 डिग्री है। आगे पढ़ें...
आंखों में सुकून व चमक लेकर घर लौटे 2311 प्रवासी मजदूर, बोले- अब न जाएंगे परदेस
लॉकडाउन के चलते महाराष्ट्र, गुजरात सहित कई राज्यों में फंसे श्रमिकों को घर पहुंचाने का प्रदेश सरकार का अभियान जारी है। इसी क्रम में महाराष्ट्र के अंकोला और गुजरात के वड़ोदरा से 2311 कामगार श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से लखनऊ पहुंचे। यहां से इन्हें 104 बसों से इनके गृह जनपद भेजा गया। आंखों में सुकून व चमक लेकर घरों की ओर रवाना हुए इन कामगारों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताते हुए कहा कि सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है। आगे पढ़ें...
कानपुर: नोएडा से पति संग गर्भवती दो सौ किमी पैदल चल पहुंची गांव, नम आंखों से बयां किया दर्द
पूरे देश में लॉकडाउन होने के बाद नोएडा में मजदूरी करने वाला युवक आठ माह की गर्भवती पत्नी को 25 मार्च को पैदल ही गांव के लिए निकल पड़ा। रविवार को गांव पहुंची गर्भवती ने ग्रामीणों के सामने रोते हुए बताया कि वह करीब 200 किमी पैदल चली है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के प्रकोप से गर्भ में पल रहे बच्चे को बचाने की चिंता के चलते ऐसा कदम उठाया। आगे पढ़ें...
घर पहुंचने के लिए पति-पत्नी 600 किमी पैदल चले, बोले रुकते तो कोरोना नहीं भूख से मरते
कोराना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए पूरे देश में लॉकडाउन की घाेषणा के बाद लोग अपने घरों की ओर भाग रहे हैं। ऐसे में घर वापसी के लिए रुपये न होने पर एक मजदूर परिवार गुरुग्राम से पैदल ही निकल पड़ा। छह सौ किमी से अधिक का सफर तय करने पर इन लोगों के पैरों में छाले पड़ गए। परिवार की महिलाओं के थकने पर उन्हें हाथ ठेला में बैठाकर खींचते थे। मासूम बच्चों व महिलाओं सहित बुधवार को कस्बा पहुंचे इस परिवार ने जीआरवी कालेज में स्वास्थ्य परीक्षण कराया। आगे पढ़ें..
आगरा : पैदल चलते-चलते थक गया बेटा तो मां ने सूटकेस पर लिटाकर तय किया सफर
लॉकडाउन में लाकोरोना संकट के बीच लॉकडाउन के कारण दूसरे राज्यों में फंसे श्रमिकों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए विशेष ट्रेन चलाई जा रही हैं। प्रदेश सरकार रोडवेज बसें चलवा रही है, लेकिन इन सबके बीच कई श्रमिक दुश्वारियों का बोझ ढोने को मजबूर हैं। कोई पैदल ही घर जा रहा है तो कोई साइकिल से..। सबकी अपनी-अपनी कहानियां हैं। इनकी मार्मिक तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। ऐसा ही एक वीडियो आगरा से सामने आया है। आगे पढ़ें...
मेरठ: बेबस-गुमशुम और उदास चेहरा, कोरोना से ज्यादा भूख से मरने का डर, आंखों में सिर्फ आंसू
बेबस, गुमशुम और हर चेहरा उदास। जिन बच्चों को गोद में होना चाहिए था, वो भी सड़कों पर परिवार के साथ घिसटते- बिलखते पैदल चलते नजर आ रहे हैं। मेरठ शहर की कोई सड़क ऐसी नहीं है, जहां पर वाहनों की तुलना में कई गुना ज्यादा पैदल यात्री न नजर आ रहे हों। लोग धूप में तीन- तीन माह के बच्चों को लेकर सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर हैं। ये वे लोग हैं जो अपने गांवों से आंखों में कुछ सुनहरे सपने लेकर शहरों में आए थे। मेहनत मजदूरी कर किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन ने इन्हें सड़क पर ला दिया। जब भूखे पेट नहीं रहा गया तो झोला उठाकर निकल पड़े हैं अपने गांवों की ओर। आगे पढ़ें...
गोरखपुर: लॉकडाउन में फंसे लोगों ने बताई ये बात, कहा- कुछ दिन और रहते तो भूखे मर जाते
लॉकडाउन में फंसे श्रमिक और उनके घरवाले बृहस्पतिवार को रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो उनके चेहरों पर खुशी के भाव थे। हो भी क्यों ना, अपने घर पहुंच गए थे। अब उन्हें न तो बच्चों के रोने की चिंता थी और न ही निवाले की। रेलवे स्टेशन पर श्रमिकों से बात की गई तो उन्होंने अपनी तकलीफें साझा कीं। बोले, फैक्ट्रियां बंद हैं, काम है नहीं। कुछ दिन और रहते तो भूखे मर जाते। आगे पढ़ें...
वाराणसी: परिजन कर रहे थे इंतजार, मुंबई से जौनपुर के रास्ते में ही 60 किमी पहले तोड़ दिया दम
मुंबई से घर आ रहे एक मजदूर ने घर की दहलीज तक पहुंचने से 60 किमी पहले ही दम तोड़ दिया। प्रयागराज स्टेशन से रोडवेज बस में जौनपुर जाते समय तबीयत खराब होने पर उसे बृहस्पतिवार की रात मुंगराबादशाहपुर के क्वारंटीन सेंटर में रोक लिया गया था, जहां शुक्रवार की सुबह उसकी मौत हो गई। मजदूर को तेज बुखार और सांस फूलने की समस्या थी। आगे पढ़ें...