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उपलब्धि: भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक से पैदा हुई पहली मारवाड़ी घोड़ी ‘राज प्रथमा’, वजन 23 किलोग्राम

Sat, 20 May 2023 01:10 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Sat, 20 May 2023 01:10 AM IST
सार

बीकानेर अश्व अनुसंधान केंद्र में भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक से मारवाड़ी प्रजाति की पहली घोड़ी विकसित की है। जिसका वजन 23 किलोग्राम है। नई तकनीक बांझ घोड़ी से भी बच्चे पैदा किए जा सकेंगे।

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First Marwari mare born by embryo transfer technique at Bikaner Horse Research Center
भ्रूण प्रत्यारोपण से पैदा हुई घोड़ी को जांचते वैज्ञानिक यशपाल शर्मा व उनके सहयोगी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

राजस्थान के बीकानेर स्थित अश्व अनुसंधान केंद्र में पशु वैज्ञानिकों ने भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक से मारवाड़ी प्रजाति की पहली घोड़ी पैदा की है। भ्रूण स्थानांतरण प्रौद्योगिकी में ब्लास्टोसस्ट अवस्था (गर्भाधान के 7.5 दिन बाद) में एक निषेचित भ्रूण को दाता घोड़ी से एकत्र किया गया। सेरोगेट मां ने शुक्रवार को स्वस्थ घोड़ी को जन्म दिया, जिसका नाम ‘राज-प्रथमा’ रखा गया। इस घोड़ी का वजन 23 किलोग्राम है।
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बीकानेर अश्व अनुसंधान केंद्र इस प्रक्रिया को पूरा करने वाला देश का पहला संस्थान बन गया है। मारवाड़ी घोड़ों की नस्ल को संरक्षित करने व प्रसार करने के लिए केंद्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र ने बेहद लगन से काम किया।
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मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों के भ्रूणों को हिमतापीय परिरक्षण करने के लिए एक परियोजना शुरू की गई थी। राष्ट्रीय पशुधन मिशन की एक योजना के तहत डॉ. टीआर टल्लूरी, डॉ. यशपाल शर्मा, डॉ. आरए लेघा, डॉ. आरके देदार ने मारवाड़ी घोड़ी में सफल भ्रूण स्थानांतरित किया। टीम को डॉ. सज्जन कुमार, मनीष चौहान ने भी सहयोग दिया।
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बांझ घोड़ी से भी बच्चे पैदा किए जा सकेंगे
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कृषि प्रबंधन में सहायता की। अब तक इस टीम ने दस मारवाड़ी घोड़ों के भ्रूणों को सफलतापूर्वक विट्रीफिगेशन भी किया है। अब अधिक घोड़ों के भ्रूणों का हिमतापीय परिरक्षण किया जाएगा। राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. टीके भट्टाचार्य ने बताया कि भारत में घोड़ों की आबादी तेजी से घट रही है। इसके पीछे बांझपन तथा गैर प्रजनन वाली घोड़ी इसका बड़ा कारण है। इस तकनीक बांझ घोड़ी से भी बच्चे पैदा किए जा सकेंगे। अच्छी किस्म के घोड़े तैयार करने के लिए यह तकनीक बेहद कारगर साबित होगी।
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