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Hisar News: पराली जलाई तो प्राथमिकी दर्ज होेगी, 30 हजार रुपये तक लगेगा जुर्माना
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बास। धान की कटाई का सीजन शुरू होने के साथ पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कृषि विभाग ने गांव-गांव जागरूकता अभियान शुरू कर दिया है। बुधवार को गांव बास और मदनहेड़ी में किसानों के लिए जागरूकता शिविर लगाए गए।
खंड कृषि अधिकारी नारनौंद पवन भारद्वाज ने किसानों को बताया कि फसल अवशेष जलाने पर केस दर्ज होने के साथ नियमों के तहत 5,000 से 30,000 रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा संबंधित किसान की रेड एंट्री की जाती है। रेड एंट्री होने के बाद किसान तीन साल तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अपनी फसल नहीं बेच सकेगा और सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रहेगा।
भारद्वाज ने किसानों को पराली जलाने से होने वाले पर्यावरणीय और कृषि संबंधी नुकसान की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव और कई पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और आगामी फसलों की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। पराली के धुएं से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिसका लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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उन्होंने किसानों से पराली जलाने के बजाय उसे उचित तरीके से खेत में मिलाकर खाद के रूप में इस्तेमाल करने की अपील की। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है और उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। फसल अवशेषों का उपयोग बायोमास और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने में भी किया जा सकता है।
अधिकारियों ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़ी सरकारी योजनाओं, तकनीकी उपायों और कृषि यंत्रों की जानकारी दी। योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवेदन करने वाले किसानों के आवेदनों की जांच और उपकरणों की स्थापना की प्रक्रिया निर्धारित तरीके से पूरी की जाएगी।शिविर में कृषि पर्यवेक्षक अनिल कुमार, गांव के सरपंच, नंबरदार और अन्य ग्रामीण मौजूद रहे।
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खंड कृषि अधिकारी नारनौंद पवन भारद्वाज ने किसानों को बताया कि फसल अवशेष जलाने पर केस दर्ज होने के साथ नियमों के तहत 5,000 से 30,000 रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके अलावा संबंधित किसान की रेड एंट्री की जाती है। रेड एंट्री होने के बाद किसान तीन साल तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अपनी फसल नहीं बेच सकेगा और सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रहेगा।
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भारद्वाज ने किसानों को पराली जलाने से होने वाले पर्यावरणीय और कृषि संबंधी नुकसान की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव और कई पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और आगामी फसलों की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। पराली के धुएं से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिसका लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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उन्होंने किसानों से पराली जलाने के बजाय उसे उचित तरीके से खेत में मिलाकर खाद के रूप में इस्तेमाल करने की अपील की। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है और उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। फसल अवशेषों का उपयोग बायोमास और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने में भी किया जा सकता है।
अधिकारियों ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन से जुड़ी सरकारी योजनाओं, तकनीकी उपायों और कृषि यंत्रों की जानकारी दी। योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवेदन करने वाले किसानों के आवेदनों की जांच और उपकरणों की स्थापना की प्रक्रिया निर्धारित तरीके से पूरी की जाएगी।शिविर में कृषि पर्यवेक्षक अनिल कुमार, गांव के सरपंच, नंबरदार और अन्य ग्रामीण मौजूद रहे।