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मनीष हत्याकांड: कारोबारी की मौत पर हत्या का केस, फिर गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं?

Sat, 09 Oct 2021 11:23 AM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 09 Oct 2021 11:23 AM IST
सार

कारोबारी मनीष की मौत के दस दिन बाद भी पुलिस खाली हाथ है। पुलिस ने साक्ष्य संकलन के नाम पर समय बर्बाद किया और अब आरोपी पकड़ से दूर निकल गए।

 

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Manish murder case Why arrest not yet made after registration of murder case on death of manish
मनीष गुप्ता हत्याकांड। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की मौत पर हत्या का केस दर्ज, फिर भी आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही? वारदात के बाद से इस मामले में बार-बार पूछा जा रहा यही सवाल, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी मामले में हत्यारोपी की गिरफ्तारी न करने पर सरकार से पूछा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी जताई। गोरखपुर में भी तो कुछ यही हाल है, यहां भी कारोबारी मनीष की मौत के दस दिन बाद भी पुलिस खाली हाथ है। पुलिस ने साक्ष्य संकलन के नाम पर समय बर्बाद किया और अब आरोपी पकड़ से दूर निकल गए।
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मामले में 27 सितंबर की रात में केस दर्ज होने के बाद भी हत्यारोपियों की गिरफ्तारी नजरअंदाज करने वाली गोरखपुर पुलिस, एसआईटी टीम के गोरखपुर आने और सख्ती के बाद हरकत में आई। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छह टीमें गठित की गईं, लेकिन ये टीमें शुक्रवार को खाली हाथ लौट आईं। यह कदम समय रहते उठाया गया होता तो ऐसे हालात तो न बनते।
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घटना के बाद हत्या का केस दर्ज होने पर सामने आए एडीजी जोन अखिल कुमार ने खुद पहले साक्ष्य संकलन की बात कही थी। उनका कहना था कि साक्ष्य संकलन के आधार पर हत्यारोपी पुलिस वालों के गिरफ्तारी की जाएगी। जबकि, हत्या के मामले में जिले में शायद ही ऐसी कोई बानगी हो, जब गिरफ्तारी के लिए साक्ष्य का इंतजार किया गया हो।
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विधि विशेषज्ञ कहते हैं कि गिरफ्तारी का यही मकसद होता है कि आरोपी सुबूतों को नष्ट न कर सके। प्रत्यक्षदर्शियों, गवाहों पर दबाव न बना सके और जांच को प्रभावित न कर सके। बावजूद इसके यह सब करने में सक्षम आरोपियों की गिरफ्तारी स्थानीय पुलिस नजरअंदाज करती रही। नतीजा, पुलिस की इसी बेपरवाही ने आरोपी पुलिसकर्मियों को भूमिगत होने का मौका दे दिया। लखीमपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद से पुलिस अफसर अब साक्ष्य संकलन किए जाने के सवाल से बचते नजर आ रहे हैं।

बलिया, गाजीपुर में नोटिस चस्पा कर लौट आई गोरखपुर पुलिस

मनीष की पत्नी शुरू से ही पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा रहीं हैं। आरोप है कि पहले तो उनकी दी गई तहरीर को बदलवाकर तीन नाम बाहर किए गए। जिन पुलिस वालों पर केस दर्ज किया गया, उनके खिलाफ भी कार्रवाई में तत्परता नहीं दिखाई गई। पुलिस अगर चाहती तो बड़ी आसानी से हत्यारोपी जेएन सिंह एंड कंपनी को पकड़ लेती। स्थानीय पुलिस का उन्हें सेफ पैसेज देने का ही नतीजा है कि बड़े आराम से जेएन सिंह जीडी में पहले अक्षय मिश्रा को बीमार बताकर रिलीव करता है फिर खुद को बीमार बताकर रफूचक्कर हो जाता है। अब पुलिस टीमें इनकी तलाश में जहां-तहां खाक छान रहीं हैं।  
 
लखनऊ, बलिया, गाजीपुर में हत्यारोपित पुलिस वालों के घर पर नोटिस चस्पा कर गोरखपुर पुलिस की टीमें शुक्रवार को लौट आईं। इस दौरान पुलिस ने आरोपियों के घरवालों, उनके रिश्तेदारों से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी कि आरोपी कहां हैं? जबकि हकीकत यह है कि पुलिस शुरू से ही पूरे मामले में सिर्फ औपचारिकता ही पूरी कर रही है।
 
सीआरपीसी की धारा-169 : जेल भेजने के बावजूद राहत का रास्ता
किसी भी अपराध में गिरफ्तारी करके जेल भेजे जाने के बावजूद अभियुक्त के खिलाफ तहकीकात में पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उसे छोड़ा जा सकता है। कानूनविदों की यह आशंका थी कि ऐसे हालात कई बार बन सकते हैं। लिहाजा, बेगुनाह साबित हुए अभियुक्तों की जेल से रिहाई का प्रावधान भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 के तहत किया गया है।

सीआरपीसी की धारा-169 पुलिस को यह अधिकार देती है कि वह साक्ष्य के अभाव में अभियुक्त को आरोप से बरी करवा सके। जिले में ऐसे दर्जनों मामले पुलिस रिकॉर्ड में मिल भी जाएंगे, जब पुलिस ने धारा 169 का इस्तेमाल कर तफ्तीश में बेगुनाह प्रमाणित हुए आरोपियों को राहत दिलाई हो। पुलिस पर इस धारा के दुरुपयोग के आरोप भी लगते रहे हैं।
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