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Chandigarh News: दस साल पहले बात करने को नहीं मिलता था समय, अब सिर्फ 30 फीसदी रह गया काम
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चंडीगढ़। देश में हथकरघा उद्योग का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है। यह उद्योग भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हथकरघा से बने वस्त्र न केवल उच्च गुणवत्ता के होते हैं बल्कि उनकी डिजाइन और कारीगरी भी अद्वितीय होती है लेकिन आधुनिकता ने इसकी मांग कम कर दी है। इससे व्यवसाय भी प्रभावित हुआ है। चंडीगढ़ के दुकानदारों का कहना है कि 10 साल पहले काम इतना था कि बात करने को भी समय नहीं मिलता था लेकिन अब सिर्फ 30 फीसदी ही काम रह गया है।देश में 2015 में हथकरघा दिवस को 7 अगस्त को मनाने की घोषणा की गई थी, जिससे हाथ से बनने वाली वस्तुओं का प्रचार हो सके और वे महिलाएं जो हथकरघा करने में सक्षम हैं, उन्हें रोजगार मिल सके। शहर में कई ऐसे विक्रेता हैं, जो काफी पुराने हैं और कई सालों से हथकरघा वाली वस्तुओं को बेचते हुए आए हैं। उनमें से ही सेक्टर-17 स्थित हैंडलूम हाउस के मैनेजर मोहम्मद जलील ने बताया कि हैंडलूम हाउस 40 सालों से शहर में हथकरघा वाली वस्तुओं को बेचते हुए आया है। 10 साल पहले हथकरघा की मांग बुजुर्गों के साथ-साथ युवाओं में भी होती थी लेकिन आज सिर्फ बुजुर्गों में इसका चलन व शौक देखने को मिलता है। दस साल पहले तक बात करने का समय तक नहीं होता था लेकिन आज खरीदारी में वो बात नही रहीं, जो पहले थी।
जलील बताते हैं कि देशवासियों से ज्यादा विदेशी हैंडलूम का चलन ज्यादा है और कई विदेशी खरीदार ऐसे हैं, जो हर साल भारत हैंडलूम खरीदने आते हैं। हैंडलूम साड़ियों में कांथा वर्क, बंगाल की बाटिक प्रिंट, बांधनी साड़ी को बुजुर्ग महिलाओं के साथ-साथ युवतियां भी काफी पसंद करती हैं।
हैंडलूम में बेड कवर, साड़ियां, कॉटन और तौलियों की मांग :
युवाओं में आज हैंडलूम का प्रचलन थोड़ा कम है लेकिन जो लोग हैंडलूम की मांग करते हैं तो साड़ियां, बेड कवर, तौलियों की मांग करते हैं। जलील बताते हैं कि हैंडलूम का ट्रेंड बदला नहीं जा सकता, क्योंकि हैंडलूम भारत के हर राज्य की अपनी एक परंपरा के अनुसार तैयार किया जाता है, जिससे उसे एक व्यवस्थित रूप से बाजारों में लोगों तक पहुंचाया जा सकें।
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मशीन में धोने वाले कपड़ों को खरीदना ज्यादा पसंद :
सेक्टर-22 के कर्टन हाउस के विक्रेता सतीश तिवारी बताते हैं कि कोविड से पहले एक बार फिर से दौर आया था कि लोगों ने हैंडलूम को खरीदना और पहनना शुरू कर दिया था लेकिन कोविड के बाद से लोगों ने फिर से हैंडलूम को अपनी पसंद की सूची से बाहर कर दिया। उन्होंने कहा कि आज माॅर्डन जमाना है। हाथ से बने कपड़ों का रखरखाव करने के लिए लोगों के पास समय नहीं है। हैंडलूम वस्तुओं को लिए रखरखाव की जरूरत भी ज्यादा होती है लेकिन आज लोग मशीन में धोने वाले कपड़ों को खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं।
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जलील बताते हैं कि देशवासियों से ज्यादा विदेशी हैंडलूम का चलन ज्यादा है और कई विदेशी खरीदार ऐसे हैं, जो हर साल भारत हैंडलूम खरीदने आते हैं। हैंडलूम साड़ियों में कांथा वर्क, बंगाल की बाटिक प्रिंट, बांधनी साड़ी को बुजुर्ग महिलाओं के साथ-साथ युवतियां भी काफी पसंद करती हैं।
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हैंडलूम में बेड कवर, साड़ियां, कॉटन और तौलियों की मांग :
युवाओं में आज हैंडलूम का प्रचलन थोड़ा कम है लेकिन जो लोग हैंडलूम की मांग करते हैं तो साड़ियां, बेड कवर, तौलियों की मांग करते हैं। जलील बताते हैं कि हैंडलूम का ट्रेंड बदला नहीं जा सकता, क्योंकि हैंडलूम भारत के हर राज्य की अपनी एक परंपरा के अनुसार तैयार किया जाता है, जिससे उसे एक व्यवस्थित रूप से बाजारों में लोगों तक पहुंचाया जा सकें।
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मशीन में धोने वाले कपड़ों को खरीदना ज्यादा पसंद :
सेक्टर-22 के कर्टन हाउस के विक्रेता सतीश तिवारी बताते हैं कि कोविड से पहले एक बार फिर से दौर आया था कि लोगों ने हैंडलूम को खरीदना और पहनना शुरू कर दिया था लेकिन कोविड के बाद से लोगों ने फिर से हैंडलूम को अपनी पसंद की सूची से बाहर कर दिया। उन्होंने कहा कि आज माॅर्डन जमाना है। हाथ से बने कपड़ों का रखरखाव करने के लिए लोगों के पास समय नहीं है। हैंडलूम वस्तुओं को लिए रखरखाव की जरूरत भी ज्यादा होती है लेकिन आज लोग मशीन में धोने वाले कपड़ों को खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं।