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कृषि यंत्र उद्योग पर भी कोरोना की मार, कारोबारी परेशान
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वाराणसी। कोरोना के चलते लॉकडाउन होने से कृषि यंत्रों के कारोबार पर जबरदस्त असर पड़ा है। वाराणसी में करीब 100 करोड़ का वार्षिक कारोबार होता था। लेकिन इस बार इसमें करीब 40 फीसदी की गिरावट आई है। गेहूं मड़ाई के सीजन में एक भी यंत्र नहीं बिका और बांग्लादेश और नेपाल के अलावा देश के अन्य राज्यों के आर्डर निरस्त हो गए।
उद्यमियों के अनुसार पंजाब के बाद सबसे ज्यादा कृषि यंत्र बनारस में बनता है। इसका सीजनल व्यापार होता है। सबसे ज्यादा हाथ एवं पावर से चलाने वाली चारा काटने की मशीन यहां बनती है। यहां से पूर्वी और पश्चिमी यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल में कृषि यंत्रों की सप्लाई की जाती है। लॉकडाउन के कारण गेहूं काटने की मशीन थ्रेशर बन ही नहीं पाया। वहीं जो बना था, उसकी बिक्री नहीं हो पाई। फैक्टरियों में कच्चा माल तथा बना हुआ थ्रेशर डंप है। इससे पूंजी फंस गई है।
वर्षों पहले जब ट्रांसपोर्ट के साधन कम थे तब पंजाब से कृषि यंत्र मंगाने में समय लगता था। तब बनारस में कृषि यंत्रों के निर्माण की नींव रखी गई। वाराणसी में करीब 20 कृषि यंत्रों के कारखाने हैं। सरकार ने कुछ समय पहले कृषि यंत्रों के निर्माण करने वाले कारखानों को खोलने की इजाजत दी थी लेकिन मजदूरों के रहने के कारण काम शुरू नहीं हो पाया है। ज्यादातर बिहार और झारखंड के मजदूर थे। वे घर जाने के बाद आना नहीं चाहते हैं।
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उद्यमियों के अनुसार पंजाब के बाद सबसे ज्यादा कृषि यंत्र बनारस में बनता है। इसका सीजनल व्यापार होता है। सबसे ज्यादा हाथ एवं पावर से चलाने वाली चारा काटने की मशीन यहां बनती है। यहां से पूर्वी और पश्चिमी यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल में कृषि यंत्रों की सप्लाई की जाती है। लॉकडाउन के कारण गेहूं काटने की मशीन थ्रेशर बन ही नहीं पाया। वहीं जो बना था, उसकी बिक्री नहीं हो पाई। फैक्टरियों में कच्चा माल तथा बना हुआ थ्रेशर डंप है। इससे पूंजी फंस गई है।
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वर्षों पहले जब ट्रांसपोर्ट के साधन कम थे तब पंजाब से कृषि यंत्र मंगाने में समय लगता था। तब बनारस में कृषि यंत्रों के निर्माण की नींव रखी गई। वाराणसी में करीब 20 कृषि यंत्रों के कारखाने हैं। सरकार ने कुछ समय पहले कृषि यंत्रों के निर्माण करने वाले कारखानों को खोलने की इजाजत दी थी लेकिन मजदूरों के रहने के कारण काम शुरू नहीं हो पाया है। ज्यादातर बिहार और झारखंड के मजदूर थे। वे घर जाने के बाद आना नहीं चाहते हैं।
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