वाराणसी: दीपावली पर मांडवी तालाब के तट पर लगा भेले का मेला, पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
वाराणसी के मंडुआडीह स्थित मांडवी तालाब के पश्चिमी छोर पर दीपावली की शाम से पारंपरिक भेले का मेला लगता है। इसमें आसपास के जंगलों से भेले और कैथ के फल लाए जाते हैं। कैलाश सोनकर का परिवार कई पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
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काशी की पहचान धार्मिक आस्था, अध्यात्म और प्राचीन परंपराओं से है। यहां दीपावली के अवसर पर लगने वाले मेलों की भी अपनी अलग पहचान है। मंडुआडीह क्षेत्र के मांडवी तालाब के पश्चिमी छोर पर दीपावली की शाम से लगने वाला भेले का मेला इसी परंपरा का हिस्सा है। इसे आयुर्वेदिक मेले के नाम से भी जाना जाता है। मेले में मिर्जापुर, सोनभद्र, चंदौली, प्रतापगढ़ समेत आसपास के क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं। यहां पारंपरिक जंगली फल, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और बांस से बने सामान आकर्षण का केंद्र रहते हैं।
पीढ़ियों से मेले में फल बेच रहा परिवार
मेले में कैलाश सोनकर और उनका परिवार लंबे समय से भेले के फल से जुड़ी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। कैलाश सोनकर बताते हैं कि उनके परिवार की कितनी पीढ़ियां इस मेले में भेले का रस बेचती आ रही हैं, इसकी उन्हें भी जानकारी नहीं है। अब उनकी पत्नी कुमारी सोनकर और पुत्र विजय सोनकर भी इस परंपरा में सहयोग कर रहे हैं।
जंगलों से आते हैं भेले और कैथ के फल
मेले में मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली समेत आसपास के जंगलों से भेले के फल लाए जाते हैं। इसके अलावा कैथ नामक जंगली फल भी यहां बिकता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धति से जुड़े लोग इन फलों का इस्तेमाल औषधीय प्रयोजनों के लिए करते हैं। हालांकि, इनके सेवन से दमा, अस्थमा और गठिया जैसी बीमारियों में लाभ होने के दावों की चिकित्सकीय पुष्टि जरूरी है।
घरेलू सामान की भी होती है बिक्री
भेले के फल के अलावा मेले में घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं भी मिलती हैं। इनमें दौरा, सूप, चलनी, चौका-बेलन और बांस से बनी टोकरियां शामिल हैं। इस तरह मेला केवल पारंपरिक फल और चिकित्सा पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण हस्तशिल्प और घरेलू जरूरतों से जुड़े सामान की खरीदारी का भी केंद्र बनता है।
सामाजिक सद्भाव की भी मिसाल
भेले के मेले में अलग-अलग धर्मों और वर्गों के लोग पहुंचते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज के लोग भी भागीदारी करते हैं। दीपावली के अवसर पर लगने वाला यह मेला काशी की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मेलजोल की अनूठी झलक पेश करता है।