फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   tulsi

जो सब में रमते हैं, वही हैं तुलसी के राम

Mon, 27 Jul 2020 01:36 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 27 Jul 2020 01:36 AM IST
विज्ञापन
tulsi
वाराणसी। काशी शिव के त्रिशूल पर बसी है। तीन लोक से न्यारी है, जो जैसी इच्छा लेकर आता है, पाता है। यह यहां की मान्यता है। भगवान राम को हृदय में बसाए गोस्वामी तुलसीदास ने काशी में ही रामचरित मानस रचा। यह सब कुछ राम प्रभु की सेवा में ही समर्पित था। उन्होंने युग को मर्यादा पुरुषोत्तम राम दिए, परंतु युग युगांतर को तुलसी मिल गए। तुलसी ने रामचरित मानस में आदर्श जीवन जीने का संदेश दिया, जो सब में रमता है, वहीं तुलसी के राम हैं।
विज्ञापन

तुलसीदास ने राम के साथ ही रामभक्त हनुमान को भी जन-जन तक पहुंचाया। लोक मान्यता है कि आज जहां संकट मोचनमंदिर स्थित है, वहीं तुलसी को रामभक्त हनुमान के दर्शन हुए थे। उनकी प्रेरणा से हनुमान जी के तमाम मंदिर भी स्थापित किए गए। पातालपुरी मठ के महंत बालकदास का कहना है कि गोस्वामी तुलसीदास को हनुमत प्रभु का बाल रूप सबसे ज्यादा प्रिय था। काशी की गलियों में उन्होंने महाबली हनुमान के 12 मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें सात तो बालरूप ही हैं। तुलसीघाट पर उन्होंने दक्षिणमुखी हनुमत प्रतिमा स्थापित और जीवनपर्यंत उन्हीं के चरणों में ध्यान लगाया। महामारी से भयभीत लोगों को राहत दिलाने के लिए तुलसीदास ने प्रह्लादघाट में दक्षिणमुखी हनुमान की स्थापना की। यहां उनका अखाड़ा भी था।
विज्ञापन

तुलसीघाट पर चहुंदिश हनुमान
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र का कहना है कि तुलसीघाट का पूरा क्षेत्र चहुंदिश हनुमतमय है। अपने आवास प्रांगण में तुलसी ने हनुमत प्रभु की दक्षिणाभिमुख मूर्ति सजाई। बाद में अखाड़ा तुलसीदास के महंतों ने पूर्वाभिमुख, पश्चिमाभिमुख व उतराभिमुख हनुमान की मूर्तियां स्थापित कीं। माना जाता है कि बजरंगबली यहां से चारों दिशाओं पर नजर रखते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

काशी में तुलसी का विरोध व सम्मान
जनश्रुतियों और ग्रंथों से पता चलता है कि तुलसीदास को काशी के कुछ पंडितों के विरोध का भी सामना करना पड़ा था। रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने के भी प्रयास हुए। भगवान विश्वनाथ जी के मंदिर में पांडुलिपि रखी गई और मानस को विश्वनाथजी का समर्थन मिला। तब, विरोधी तुलसी के सामने नतमस्तक हुए।
तुलसी की पंक्तियां बन गई मंगलगीत
पद्मश्री महामहोपाध्याय भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री का कहना है कि अपनी कृति को माता-पिता कहने वाले गोस्वामी तुलसीदास का बाल्यकाल पत्थर ह्रदय को भी पिघला देता है। माता की मृत्यु व पिता द्वारा अमंगलकारी समझकर त्याग दिए जाने वाले तुलसी की पंक्तियां बाद में मंगल गीत बन गई। जिसके जन्म के समय मंगल गीत नहीं गाए गए, उन्हीं तुलसी की चौपाइयों का पूरा विश्व गान कर रहा है। इसमें से ज्यादातर रचनाएं उन्होंने देवाधिदेव महादेव की प्रिय नगरी काशी में ही की।

रामलीला से जन-जन तक पहुंचाया श्रीराम को
अपनी कृति रामचरित मानस को प्रतिपादित करते हुए तुलसीदास ने रामलीला मंचन के माध्यम से श्रीराम की पूजा को जन-जन तक पहुंचाया। काशी में रामलीला मंचन की परंपरा आज भी कायम है। उनकी रचनाओं की बात करें तो गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या में 35 दोहे लिखे और काशी चले आए। यहां ही भदैनी में उन्होंने रामचरित मानस को अंजाम तक पहुंचाया। गोपाल मंदिर में उन्होंने विनय पत्रिका की रचना की। दोहावली, गीतावली, कवितावली को भी पंक्तिबद्ध किया। आस्था और संघर्ष के इस संत कवि को जीवन के अंतिम समय में अस्तित्व का संकट भी मिला। इसी दौरान बाहुपीड़ा के समय उन्होंने हनुमान बाहुक लिखा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed