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करो या मरो के नारे के साथ धधक उठी थी आजादी की आग
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असहयोग आंदोलन के दौरान काशी में भी क्रांति का चिंगारी ने मशाल का रूप ले लिया था। करो या मरो के नारे के साथ काशी की जनता सड़क पर उतर आई। काशी विद्यापीठ के शिक्षक और छात्रों ने आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजी फौज हॉस्टल तक पहुंच गई और विद्यार्थियों सहित शिक्षकों को गिरफ्तार कर लिया।
वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन का निर्णायक संघर्ष आरंभ होने के साथ ही काशी विद्यापीठ में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। जनता भी सड़क पर आ गई थी। पुलिस अधिकारियों का दल मैदागिन स्थित कांग्रेस कार्यालय को सील करने के बाद सबसे पहले काशी विद्यापीठ की ओर पहुंचा। विद्यापीठ परिसर में ताला बंद कर दिया गया। हॉस्टल में छापे मारे गए। गिरफ्तार होने वालों में डॉ. संपूर्णानंद, आचार्य बीरबल सिंह, प्रो. राजाराम शास्त्री, विश्वनाथ शर्मा आदि प्रमुख थे। विद्यापीठ के छात्रों ने अपने क्षेत्रों में रहकर आंदोलन को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाल बहादुर शास्त्री इलाहाबाद में गिरफ्तार कर लिए गए। पं. कमलापति त्रिपाठी भी मुंबई से लौटते वक्त गिरफ्तार किए गए। असहयोग आंदोलन में गांधीजी के आह्वान पर बीएचयू में अध्यापन छोड़कर आचार्य कृपलानी आंदोलन में शामिल हुए।
विद्यापीठ को घोषित किया गैरकानूनी संस्था
1932 में सत्याग्रह आंदोलन के समय प्रांतीय सरकार ने कांग्रेस कमेटियों के साथ-साथ विद्यापीठ को भी गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। पुलिस ने भवन में ताला लगा दिया और पहरा बैठा दिया। 1934 में प्रतिबंध हटाया गया। ढाई वर्ष तक यहां के छात्र और अध्यापक जेल में रहे।
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वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन का निर्णायक संघर्ष आरंभ होने के साथ ही काशी विद्यापीठ में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। जनता भी सड़क पर आ गई थी। पुलिस अधिकारियों का दल मैदागिन स्थित कांग्रेस कार्यालय को सील करने के बाद सबसे पहले काशी विद्यापीठ की ओर पहुंचा। विद्यापीठ परिसर में ताला बंद कर दिया गया। हॉस्टल में छापे मारे गए। गिरफ्तार होने वालों में डॉ. संपूर्णानंद, आचार्य बीरबल सिंह, प्रो. राजाराम शास्त्री, विश्वनाथ शर्मा आदि प्रमुख थे। विद्यापीठ के छात्रों ने अपने क्षेत्रों में रहकर आंदोलन को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाल बहादुर शास्त्री इलाहाबाद में गिरफ्तार कर लिए गए। पं. कमलापति त्रिपाठी भी मुंबई से लौटते वक्त गिरफ्तार किए गए। असहयोग आंदोलन में गांधीजी के आह्वान पर बीएचयू में अध्यापन छोड़कर आचार्य कृपलानी आंदोलन में शामिल हुए।
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विद्यापीठ को घोषित किया गैरकानूनी संस्था
1932 में सत्याग्रह आंदोलन के समय प्रांतीय सरकार ने कांग्रेस कमेटियों के साथ-साथ विद्यापीठ को भी गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। पुलिस ने भवन में ताला लगा दिया और पहरा बैठा दिया। 1934 में प्रतिबंध हटाया गया। ढाई वर्ष तक यहां के छात्र और अध्यापक जेल में रहे।
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