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तो ऐसे कैसे बचेगी धरती...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 23 Apr 2016 01:49 AM IST
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धरती के तापमान में इजाफे से पूरी दुनिया चिंतित है। ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए तमाम जतन किए जा रहे हैं। मगर लगातार बढ़ती आबादी और पर्यावरण संरक्ष्ाण की अनदेखी के चलते सारे प्रयास निरर्थक साबित हो रहे हैं। धरती गर्म हो रही है और भूजल लगातार नीचे जा रहा है। सड़कों के लिए पेड़ों की कटाई हो रही है तो खेतों को उजाड़कर आशियाने बसाए जा रहे हैं। सब कुछ प्रकृति के खिलाफ हो रहा है। गहराते पेयजल संकट, धरती के बढ़ते तापमान और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में मुसीबतें आनी शुरू हो गई हैं। गर अब भी नहीं संभले तो आने वाली पीढ़ी को प्रकृति से छेड़छाड़ की भारी कीमत चुकानी होगी।
धरती का तापमान यूं ही नहीं बढ़ रहा है। प्राकृतिक आपदा सूखा, बाढ़ और बारिश की बढ़ती घटनाओं के लिए खुद हम-आप भी जिम्मेदार हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और धड़ल्ले से हो रही पेड़ों की कटाई इस असंतुलन की बड़ी वजह है। विकास के नाम पर सिर्फ बनारस में तीन महीने के अंदर 16 हजार पेड़ काट दिए गए। ऐसे में हालात का अंदाज का लगाना कठिन नहीं। पर्यावरण को संरक्षित करना आज सबसे बड़ी चुनौती के रूप में है।
बनारस से गोरखपुर, आजमगढ़ और लखनऊ मार्ग को फोर लेन बनाने का काम शुरू है। सड़क चौड़ी करने के दौरान किनारे आने वाले पेड़ों को धड़ल्ले से काटा जा रहा है। यहां फोर लेन के दायरे में 15826 पेड़ आए। इनमें गोरखपुर मार्ग पर 7917, आजमगढ़ मार्ग पर 2302 और लखनऊ मार्ग पर 5607 पेड़ थे। इनमें अधिकतर काटे जा चुके हैं, कुछ की कटाई अभी चल रही है। लेकिन, इसके बदले एक भी पेड़ अब तक वन विभाग या संबंधित किसी भी विभाग की ओर से लगाया नहीं गया है। हालांकि वन विभाग के डीएफओ मूलचंद्र का कहना है कि तीनों राष्ट्रीय राजमार्गों पर जहां भी पेड़ काटे जा रहे हैं, बारिश का मौसम शुरू होने के बाद उन स्थानों पर एक पेड़ के बदले दो पेड़ लगाए जाएंगे।
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उपजाऊ जमीन पर ‘कॉलोनियों’ की खेती से जिले में हालात दिनों दिन संकटपूर्ण होते जा रहे हैं। कृषि योग्य जमीन की प्लाटिंग कर कालोनाइजर मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हैं। खासकर शहर से सटे गांवों में पिछले कुछ वर्षों में अवैध कॉलोनियां तेजी से आबाद हुईं हैं। अन्नदाताओं का सिकुड़ता दायरा आने वाले समय में खाद्यान्न का संकट और धरती का तापमान और बढ़ाएगा लेकिन कृषि योग्य भूमि के संरक्षण की कोई ठोस कार्ययोजना अब तक सामने नहीं आ पाई है। हालात ऐसे हैं कि पिछले दस साल में ही 678 हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन कम हो गई है।
आंकड़ों की बात करें तो 2006 में वाराणसी में 95842 हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन थी। यानी इस जमीन पर खेती होती थी। फल के बगीचे थे। सब्जियों के खेत थे। मगर अब यह दायरा घटकर 95164 हेक्टेअर पहुंच गया है। यह तब है जब तमाम बंदिशें हैं। मगर कुछ किसान तो मजबूरी और कुछ पैसों की चाहत में अन्न उगाने वाली धरती को बेच दे रहे हैं। ऊपर से कालोनाइजरों का सिंडिकेट इतना सक्रिय है कि शहरी सीमा से सटे इलाकों में खेती योग्य जमीन पर भी अवैध कालोनियां धड़ल्ले से बसती जा रही हैं। स्कूल, अस्पताल और सरकारी दफ्तर सब बन रहे हैं। सिंचाई के लिहाज से बनारस को संपन्न इलाका माना जाता है। यही वजह है कि यहां धान, गेहूं के साथ ही दलहन, बाजरा की भी अच्छी पैदावार होती है। यहां बड़े पैमाने पर सब्जी और गन्ना भी उगाया जाता है। फलों के बगीचे भी हैं मगर अब इनका दायरा साल दल साल कम हो रहा है।
पृथ्वी को बचाने के लिए काशी में कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आई हैं। विश्व पृथ्वी दिवस पर शुक्रवार को लंका से नरिया मार्ग पर बीएचयू से लगी चहारदीवारी के पास व्यवसाय करने वाले दूकानदारों को सामाजिक संस्था देव एक्सल फाउंडेशन एवं लक्ष्य ट्रस्ट ने डस्टबिन (कूड़ेदान) वितरित किया। सामाजिक कार्यकर्ता विनय सिंह ने बताया कि इन स्थानों पर खाने-पीने के सामानों की बिक्री होती है। इस वजह से दोना- पत्ता बाहर सड़कों पर बिखरा रहता है। थर्मोकोल और प्लास्टिक के गिलास और प्लेट प्रदूषण का कारण बनते हैं। इस मौके पर पर्यावरण संरक्षण के लिए अरसे से आंदोलन कर रहे वल्लभाचार्य पांडेय ने कहा कि कूड़े का उचित निस्तारण जरूरी है। प्लास्टिक की वजह से बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है। इस वजह से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता जागृति राही ने दूकानदारों को पर्यावरण के महत्व की जानकारी दी। कूड़ादान वितरण कार्यक्रम में ठेला पटरी व्यवसायी समिति के अध्यक्ष चिंतामणि सेठ, प्रेम कुमार सोनकर, सूरज पांडेय, शिवांग शेखर सिंह, अतुल सिंह, डॉ. इंदु पांडेय आदि शामिल थे। उधर, स्वयंसेवी संस्था ‘शुरुआत’ और देव एक्सेल फाउंडेशन के सदस्यों ने पृथ्वी दिवस एवं हनुमान जयंती के अवसर पर शिवाजी नगर कालोनी के उद्यान में वृक्षारोपण किया। इसके पूर्व चिल्ड्रेंस अकादमी के बच्चों ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से रैली निकाली। कैंट विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के नेतृत्व में उद्यान में वृक्षारोपण किया गया। इस कार्यक्रम में श्रेया श्रीवास्तव, दिव्या सिंह, कुशाग्र श्रीवास्तव, विशाल, यश अग्रवाल, अभिजीत सिंह, अक्षय, अजय और रतन एकता सिंह, आनंद तिवारी, रवि सिंह, प्रगति पथ फाउंडेशन के दीपक पुजारी, नीलम पटेल आदि शामिल थे।
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धरती का तापमान यूं ही नहीं बढ़ रहा है। प्राकृतिक आपदा सूखा, बाढ़ और बारिश की बढ़ती घटनाओं के लिए खुद हम-आप भी जिम्मेदार हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और धड़ल्ले से हो रही पेड़ों की कटाई इस असंतुलन की बड़ी वजह है। विकास के नाम पर सिर्फ बनारस में तीन महीने के अंदर 16 हजार पेड़ काट दिए गए। ऐसे में हालात का अंदाज का लगाना कठिन नहीं। पर्यावरण को संरक्षित करना आज सबसे बड़ी चुनौती के रूप में है।
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बनारस से गोरखपुर, आजमगढ़ और लखनऊ मार्ग को फोर लेन बनाने का काम शुरू है। सड़क चौड़ी करने के दौरान किनारे आने वाले पेड़ों को धड़ल्ले से काटा जा रहा है। यहां फोर लेन के दायरे में 15826 पेड़ आए। इनमें गोरखपुर मार्ग पर 7917, आजमगढ़ मार्ग पर 2302 और लखनऊ मार्ग पर 5607 पेड़ थे। इनमें अधिकतर काटे जा चुके हैं, कुछ की कटाई अभी चल रही है। लेकिन, इसके बदले एक भी पेड़ अब तक वन विभाग या संबंधित किसी भी विभाग की ओर से लगाया नहीं गया है। हालांकि वन विभाग के डीएफओ मूलचंद्र का कहना है कि तीनों राष्ट्रीय राजमार्गों पर जहां भी पेड़ काटे जा रहे हैं, बारिश का मौसम शुरू होने के बाद उन स्थानों पर एक पेड़ के बदले दो पेड़ लगाए जाएंगे।
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उपजाऊ जमीन पर ‘कॉलोनियों’ की खेती से जिले में हालात दिनों दिन संकटपूर्ण होते जा रहे हैं। कृषि योग्य जमीन की प्लाटिंग कर कालोनाइजर मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हैं। खासकर शहर से सटे गांवों में पिछले कुछ वर्षों में अवैध कॉलोनियां तेजी से आबाद हुईं हैं। अन्नदाताओं का सिकुड़ता दायरा आने वाले समय में खाद्यान्न का संकट और धरती का तापमान और बढ़ाएगा लेकिन कृषि योग्य भूमि के संरक्षण की कोई ठोस कार्ययोजना अब तक सामने नहीं आ पाई है। हालात ऐसे हैं कि पिछले दस साल में ही 678 हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन कम हो गई है।
आंकड़ों की बात करें तो 2006 में वाराणसी में 95842 हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन थी। यानी इस जमीन पर खेती होती थी। फल के बगीचे थे। सब्जियों के खेत थे। मगर अब यह दायरा घटकर 95164 हेक्टेअर पहुंच गया है। यह तब है जब तमाम बंदिशें हैं। मगर कुछ किसान तो मजबूरी और कुछ पैसों की चाहत में अन्न उगाने वाली धरती को बेच दे रहे हैं। ऊपर से कालोनाइजरों का सिंडिकेट इतना सक्रिय है कि शहरी सीमा से सटे इलाकों में खेती योग्य जमीन पर भी अवैध कालोनियां धड़ल्ले से बसती जा रही हैं। स्कूल, अस्पताल और सरकारी दफ्तर सब बन रहे हैं। सिंचाई के लिहाज से बनारस को संपन्न इलाका माना जाता है। यही वजह है कि यहां धान, गेहूं के साथ ही दलहन, बाजरा की भी अच्छी पैदावार होती है। यहां बड़े पैमाने पर सब्जी और गन्ना भी उगाया जाता है। फलों के बगीचे भी हैं मगर अब इनका दायरा साल दल साल कम हो रहा है।
पृथ्वी को बचाने के लिए काशी में कई स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आई हैं। विश्व पृथ्वी दिवस पर शुक्रवार को लंका से नरिया मार्ग पर बीएचयू से लगी चहारदीवारी के पास व्यवसाय करने वाले दूकानदारों को सामाजिक संस्था देव एक्सल फाउंडेशन एवं लक्ष्य ट्रस्ट ने डस्टबिन (कूड़ेदान) वितरित किया। सामाजिक कार्यकर्ता विनय सिंह ने बताया कि इन स्थानों पर खाने-पीने के सामानों की बिक्री होती है। इस वजह से दोना- पत्ता बाहर सड़कों पर बिखरा रहता है। थर्मोकोल और प्लास्टिक के गिलास और प्लेट प्रदूषण का कारण बनते हैं। इस मौके पर पर्यावरण संरक्षण के लिए अरसे से आंदोलन कर रहे वल्लभाचार्य पांडेय ने कहा कि कूड़े का उचित निस्तारण जरूरी है। प्लास्टिक की वजह से बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है। इस वजह से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता जागृति राही ने दूकानदारों को पर्यावरण के महत्व की जानकारी दी। कूड़ादान वितरण कार्यक्रम में ठेला पटरी व्यवसायी समिति के अध्यक्ष चिंतामणि सेठ, प्रेम कुमार सोनकर, सूरज पांडेय, शिवांग शेखर सिंह, अतुल सिंह, डॉ. इंदु पांडेय आदि शामिल थे। उधर, स्वयंसेवी संस्था ‘शुरुआत’ और देव एक्सेल फाउंडेशन के सदस्यों ने पृथ्वी दिवस एवं हनुमान जयंती के अवसर पर शिवाजी नगर कालोनी के उद्यान में वृक्षारोपण किया। इसके पूर्व चिल्ड्रेंस अकादमी के बच्चों ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से रैली निकाली। कैंट विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के नेतृत्व में उद्यान में वृक्षारोपण किया गया। इस कार्यक्रम में श्रेया श्रीवास्तव, दिव्या सिंह, कुशाग्र श्रीवास्तव, विशाल, यश अग्रवाल, अभिजीत सिंह, अक्षय, अजय और रतन एकता सिंह, आनंद तिवारी, रवि सिंह, प्रगति पथ फाउंडेशन के दीपक पुजारी, नीलम पटेल आदि शामिल थे।