Exclusive: 2016 के बाद से 30% छात्र ही विकल्प में चुन रहे हिंदी, सीबीएसई स्कूलों में हिंदी वैकल्पिक विषय
2016 के बाद से महज 30 फीसदी छात्र ही विकल्प में हिंदी विषय चुन रहे हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्र में सीबीएसई विद्यालयों में हिंदी वैकल्पिक विषय होने के चलते अंग्रेजी ही पहली पसंद बनी है।
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हम हिंदी भाषीय क्षेत्र के निवासी हैं। हिंदी में ही बोलना, लिखना और पढ़ना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि हमारे जिले के सीबीएसई बोर्ड के 166 विद्यालयों में हिंदी सिर्फ एक वैकल्पिक विषय है। इससे भी खराब यह है कि इस विषय का चयन कर पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या महज 30 फीसदी है।
जिले में सीबीएसई विद्यालयों की संख्या लगभग 150 है। इनमें 5 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं। सीबीएसई के सिलेबस में कक्षा 9 से ही हिंदी एक वैकल्पिक विषय हो जाता है। इन सभी विद्यालयों में कक्षा 9 से ही छात्रों को विकल्प के तौर पर हिंदी या संस्कृत विषय को चुनना होता है। ऐसे ही कक्षा 11 में प्रवेश के बाद हिंदी, कंप्यूटर और शारीरिक शिक्षा में से किसी एक विषय का चयन करना होता है। कक्षा 9 में विकल्प में सिर्फ संस्कृत होने के कारण छात्रों को मजबूरी में हिंदी विषय पढ़ना पड़ता है। हालांकि यह विवशता दो साल के बाद कक्षा 11 में प्रवेश के दौरान समाप्त हो जाती है।
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कक्षा 11 में प्रवेश के दौरान यदि क्लास में 100 बच्चे हैं तो सिर्फ 30 बच्चे ही हिंदी पढ़ते हैं। 10 या 20 बच्चे कंप्यूटर और शेष 50 शारीरिक शिक्षा पढ़न पसंद करते हैं। कक्षा 12 तक पढ़े विषयों को ही आगामी जीवन में होने वाली पढ़ाई या नौकरी के समय होने वाली परीक्षाओं का आधार माना जाता है। हिंदी कक्षा 12 तक न पढ़े जाने के कारण अधिकतम बच्चों का आधार कमजोर हो रहा है या फिर उनकी भाषा में लिंग दोष होता है। वैकल्पिक व्यवस्था के कारण हिंदी का स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा है जो आने वाले समय के लिए खराब संकेत है।
कुछ ही विद्यालय ऐसे जहां शिक्षक भी पढ़ाने में नहीं दिखाते रुचि
सीबीएसई में हिंदी विषय पढ़ने वाले बच्चे अंग्रेजी को अधिक महत्व देते हैं। यही नहीं अभिभावकों के दिमाग में भी यही बात होती है कि उनका बच्चा सीबीएसई स्कूल में पढ़ाई कर रहा तो उसे अंग्रेजी आनी चाहिए। अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि हिंदी भाषा और व्याकरण का ज्ञान भी बहुत जरूरी है। इनसे भी खराब स्थिति उन शिक्षकों की है जो हिंदी पढ़ाना नहीं चाहते।
भाषा और शब्दों का ज्ञान जरूरी
मातृभाषा के साथ ही हिंदी हम सभी की आम बोलचाल की भाषा है। हिंदी पढ़ना केवल एक विषय नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने लोगों से जुड़ने का एक माध्यम भी है। इसे न पढ़ने से भाषाई और सांस्कृतिक रूप से बच्चे कमजोर हो जाते हैं। जिससे समाज में उनकी छवि भी खराब होती है।
- सीबीएसई स्कूलों में अंग्रेजी को प्राथमिक विषय और हिंदी को वैकल्पिक विषय बनाया गया है, जो कि गलत है। हिंदी भाषीय क्षेत्र में हिंदी को कम से कम कक्षा 12 तक तो बच्चों को अनिवार्य तौर पर पढ़ना चाहिए। इससे उनका आधार मजबूत होगा। - सोनी स्वरूप, हिंदी शिक्षिका, सीएचएस बॉयज
- हिंदी मातृभाषा है। इससे ही सिलेबस को मजबूत बनाया जाता है। इसे कक्षा 12 तक वैकल्पिक नहीं होना चाहिए। इससे बच्चे का आधार मजबूत होगा। ऐसे ही संस्कृत विषय की भी दशा है। इसे भी कम से कम कक्षा 10 तक पढ़ाया जाना चाहिए। - कुंजलाता, हिंदी शिक्षिका, सीएचएस गर्ल्स