{"_id":"59635b404f1c1bf4408b4957","slug":"sawan-is-month-of-kajari-music","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रेम-विरह और यौवन के वर्णन का सर्वश्रेष्ठ महीना है सावन ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रेम-विरह और यौवन के वर्णन का सर्वश्रेष्ठ महीना है सावन
amarujala.com, written by- अनूप ओझा
Updated Tue, 25 Jul 2017 04:26 PM IST
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बनारस घराने की उप शास्त्रीय गायिका शिल्पी पॉल
- फोटो : अमर उजाला
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आषाढ़ में अमर उजाला ने आपको मेघ, मल्हार, मल्हार के विभिन्न प्रकारों के साथ ही राग देस की बंदिशों के जरिए में संगीत की फुहारों से भिंगोया था। अब हम कजरी और झूला लेकर आ रहे हैं। कजरी वह विधा है जिसमें सावन, भादों के प्रेम, वियोग और मिलन का चेहरा चेहरा सामने आता है। सावन में कजरी की बारिश में हम बनारस घराने के गायक, गायिकाओं के अलावा मंझे हुए और नवोदित लोक कलाकारों से भी आपको परिचति कराएंगे। तो तैयार हो जाइए हमारे साथ कजरी की फुहारों में भीगने के लिए...।
मतवाले सावन में विरहिन का दिल कांपता ही नहीं, झूमता भी है। हृदय में तड़प पैदा होने, हूक उठने की भी खास वजह होती है। जैसे पूरी प्रकृति निखर जाती है, उसी तरह स्त्री का मन भी मिलन की शीतलता के लिए व्याकुल हो उठता है।
यही सावन का सौंदर्य और कजरी की धुनों की मिठास वर्षा बहार का जो वर्णन लोक गायन की विधा कजरी में है वह कहीं और नहीं। यह कहना है बनार घराने की उप शास्त्रीय गायिका शिल्पी पॉल का। वह ठुमरी अंग की कजरी कुछ इस अंदाज में गाती हैं- हरि बिन कारी बदरिया छाई/बरसत घेरि घेरि चहुंदिश पे/दामिनी चमक जनाई...।
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वह कहती हैं कि राधा के पास जब हरि नहीं होते और घटा घिर जाती है। बिजुरी चमकने लगती है, तब उनके विरह में राधा गाती हैं। राधा का यही विरह लोक मानस में भी रचा बसा है। गांवों में महिलाएं भी कमाने गए पिया की याद में विरह से झुलसने लगती हैं। उनके होठ थरथराने लगते हैं।
यह विरह का महीना है। कारे बादलों के छाने के बाद प्रकृति का प्रभाव मन पर पड़ता है। बादलों की उमड़-घुमड़ के बीच बिजुरी चमकती है तो उससे मन में एक डर सा छा जाता है। वह मिर्जापुरी कजरी गाती हैं- जब धान के खेत में पति भींगता रहता है। रिमझिम बरसे ले बदरिया/सखिया गावेलीं कजरिया मोर संवरिया भींजे ना/ओही धनवां के कियरिया मोर संवरिया भींजे ना...।
यह कजरी भी खूब लोकप्रिय है- मोहे सावन में झुलनी गढ़ाय दा पिया, मेहंदी रचाय दा पिया ना...। वहीं सावन आने पर जिस स्त्री का पति परदेस से नहीं लौटता है, तब वह बिरह की कजरी गाने लगती है- सावन हे सखि सगरो सुहावन रिमझिम बरसे ला मेघ हे/सबके बलमुआ घर चलि अइलन हमरो बलम परदेस हे...।
शिल्पा कहती हैं कि यह प्यार का मौसम है। वह राग राग देस में कजरी की बंदिश गुनगुनाती हैं- हे मां कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए.../ ज्यो ज्यों पपिहा पिहू पिहू रटत है/ बरसत सावन तुम बिन सेज मोरा जियरा मोरा तरसे...।
बारिश पीर देस में उभरती है। कजरी - घिर आई है कारी बदरिया राधे बिन लागे ना मोरा जिया...। छिन जमुना तट छिन कुंजन में... बिरहा व्यथा से रहत है मनवा... राधे बिना लागेल मोरा जिया....।
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मतवाले सावन में विरहिन का दिल कांपता ही नहीं, झूमता भी है। हृदय में तड़प पैदा होने, हूक उठने की भी खास वजह होती है। जैसे पूरी प्रकृति निखर जाती है, उसी तरह स्त्री का मन भी मिलन की शीतलता के लिए व्याकुल हो उठता है।
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यही सावन का सौंदर्य और कजरी की धुनों की मिठास वर्षा बहार का जो वर्णन लोक गायन की विधा कजरी में है वह कहीं और नहीं। यह कहना है बनार घराने की उप शास्त्रीय गायिका शिल्पी पॉल का। वह ठुमरी अंग की कजरी कुछ इस अंदाज में गाती हैं- हरि बिन कारी बदरिया छाई/बरसत घेरि घेरि चहुंदिश पे/दामिनी चमक जनाई...।
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वह कहती हैं कि राधा के पास जब हरि नहीं होते और घटा घिर जाती है। बिजुरी चमकने लगती है, तब उनके विरह में राधा गाती हैं। राधा का यही विरह लोक मानस में भी रचा बसा है। गांवों में महिलाएं भी कमाने गए पिया की याद में विरह से झुलसने लगती हैं। उनके होठ थरथराने लगते हैं।
यह विरह का महीना है। कारे बादलों के छाने के बाद प्रकृति का प्रभाव मन पर पड़ता है। बादलों की उमड़-घुमड़ के बीच बिजुरी चमकती है तो उससे मन में एक डर सा छा जाता है। वह मिर्जापुरी कजरी गाती हैं- जब धान के खेत में पति भींगता रहता है। रिमझिम बरसे ले बदरिया/सखिया गावेलीं कजरिया मोर संवरिया भींजे ना/ओही धनवां के कियरिया मोर संवरिया भींजे ना...।
यह कजरी भी खूब लोकप्रिय है- मोहे सावन में झुलनी गढ़ाय दा पिया, मेहंदी रचाय दा पिया ना...। वहीं सावन आने पर जिस स्त्री का पति परदेस से नहीं लौटता है, तब वह बिरह की कजरी गाने लगती है- सावन हे सखि सगरो सुहावन रिमझिम बरसे ला मेघ हे/सबके बलमुआ घर चलि अइलन हमरो बलम परदेस हे...।
शिल्पा कहती हैं कि यह प्यार का मौसम है। वह राग राग देस में कजरी की बंदिश गुनगुनाती हैं- हे मां कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए.../ ज्यो ज्यों पपिहा पिहू पिहू रटत है/ बरसत सावन तुम बिन सेज मोरा जियरा मोरा तरसे...।
बारिश पीर देस में उभरती है। कजरी - घिर आई है कारी बदरिया राधे बिन लागे ना मोरा जिया...। छिन जमुना तट छिन कुंजन में... बिरहा व्यथा से रहत है मनवा... राधे बिना लागेल मोरा जिया....।