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संस्कृत विश्वविद्यालय की पहली वेधशाला का लौटेगा गौरव, इंटैक की मदद से विवि कराएगा जीर्णोद्धार

Sun, 14 Mar 2021 04:08 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sun, 14 Mar 2021 04:08 PM IST
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observatory will reinstall in sampurnanand Sanskrit University varanasi INTACH will renovated
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय - फोटो : अमर उजाला

वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में स्थित वेधशाला का गौरव फिर से लौटेगा। देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों में सबसे पहले यहां स्थापित यह वेधशाला फिर से ग्रहों की सूक्ष्म गणना करेगी। दो दशक के लंबे अंतराल के बाद महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी वेधशाला को खोलने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और इंटैक के प्रयास से वेधशाला का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। वेधशाला फिर से शुरू करने के लिए विश्वविद्यालय ने पहल की है। इस पहल पर इंटैक ने वेधशाला के खराब पत्थर बदलने और यंत्रों को दुरुस्त करने के लिए आर्थिक मदद की है। वर्तमान सत्र में छात्रों को इस वेधशाला का लाभ मिल सकेगा।
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कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने बताया कि वेधशाला का जीर्णोद्धार हो जाने के बाद ग्रहों की सटीक गणना होगी। ज्योतिष के छात्रों के लिए सर्वोच्च प्रायोगिक वातावरण भी मिलेगा। इंटैक की मदद से वेधशाला के पत्थरों को बदला जाएगा। संभावना है कि वर्तमान सत्र में छात्रों को यह प्रायोगिक कार्य के लिए उपलब्ध हो जाएगी।

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देश भर में बनी थीं पांच वेधशालाएं
ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष प्रो. अमित कुमार शुक्ल ने बताया कि महाराजा सवाई जयसिंह ने देश भर में पांच स्थानों पर वेधशालाओं का निर्माण कराया था। इसमें जयपुर, दिल्ली, मथुरा, उज्जैन और काशी शामिल हैं। जयपुर में 19 यंत्रों की सर्व सुविधा संपन्न वेधशाला आज भी है। इसके बाद दिल्ली में 13 यंत्रों की, मथुरा में पांच यंत्रों की वेधशाला थी, जो अब पूरी तरह से नष्टï हो चुकी है। इसके बाद छह यंत्रों की वेधशाला मानमंदिर घाट पर वाराणसी में बनाई गई थी।

जयपुर के ज्योतिर्विद ने किया था सहयोग
प्राच्य विद्या के प्राचीनतम केंद्र संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में वेधशाला न होने के कारण ज्योतिष के छात्र प्रायोगिक ज्ञान से वंचित रह जाते थे। इसे देखते हुए तत्कालीन कुलपति प्रो. विद्या निवास मिश्र ने वर्ष 1992 में परिसर में महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी वेधशाला का निर्माण करवाया था। इसके निर्माण में जयपुर के प्रख्यात ज्योतिर्विद् पं. कल्याण दत्त शर्मा का विशेष सहयोग रहा। इस वेधशाला का शुभारंभ 23 अगस्त 1992 को सूबे के तत्कालीन राज्यपाल वी. सत्यनारायण रेड्डी ने किया था। दो-तीन वर्ष तक वेधशाला का उपयोग किया गया। इसके बाद परिसर में ताला लगा दिया गया। विशिष्टजनों के आगमन के दौरान ही वेधशाला का ताला खुलता है।

वेधशाला में स्थित यंत्र
याम्योतर धरातलीय चाप तुरीय यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, कर्क राशि वलय यंत्र, मकर राशि वलय यंत्र, भारतीय तारामंडल, याम्योतर धरातलीय चाप तुरीय यंत्र, शंकु यंत्र और भारतीय तारामंडल सहित 11 यंत्र वेधशाला में स्थित हैं। वेधशाला में स्थित भारतीय तारामंडल अत्यंत ही रोचक और ज्ञान प्रदान करने वाला है।

वेधशाला में देख सकेंगे ग्रह नक्षत्रों को
वेधशाला में टेलीस्कोप के माध्यम से आकाश में ग्रह नक्षत्रों को देखा जा सकता है। खगोलीय घटनाओं उल्कापात, ग्रहण आदि का भी अवलोकन किया जा सकता है। इसके अलावा रात्रि में नौ ग्रहों की चाल, स्थिति और उनके स्थान का भी अध्ययन हो सकेगा।

यहां हैं वेधशालाएं
लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, बीएचयू, एस्ट्रो फिजिक्स व एस्ट्रोनामी का संचालन करने वाले आईआईटी में।
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