कभी इसी स्कूल में पढ़े, अब काट रहे चौदह दिनों का क्वारंटीन वनवास
देश के अलग-अलग शहरों से अनेक परेशानियों को झेलते हुए तमाम लोग अपने गांव पहुंच रहे हैं। इन्हें गांव के ही स्कूलों में बनाए गए क्वारंटीन सेंटरों पर ठहराया जा रहा है। यह वही स्कूल हैं, जहां पढ़ते हुए उन्होंने अपने बचपन गुजारे हैं। अब इसी स्कूल में चौदह दिनों का वनवास (होम क्वारंटीन) भी काटना पड़ रहा है। यहां उनके कई सहपाठी भी मिल गए हैं।
ऐसे में बचपन के वे क्षण उन्हें अनायास याद आ जा रहे हैं। स्कूल छोड़े सालों गुजर गए, लेकिन ककहरा पढ़ाने वाले गुरुओं के नाम तो उन्हें जुबान पर याद हैं। विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग यहां सालों बाद इतने फुर्सत में मिले।
शनिवार की सुबह अमर उजाला की टीम ने ऐसे कुछ क्वारंटीन सेंटरों का हाल जानना चाहा, तो कैथवलिया गांव के प्राथमिक विद्यालय परिसर में बरगद का विशालकाय वृक्ष ही स्कूल में ठहरे प्रवासियों का सहारा बना हुआ है। इस गांव के सियाराम यादव, हनुमान यादव और धर्मेन्द्र गोंड सूरत से जबकि प्रमोद गुप्ता, धनंजय खरवार और दीपक विश्वकर्मा मुंबई से आकर यहां ठहरे हुए हैं। इन्हें तीन दशक पहले पढ़ाने वाले अपने गुरुओं सूरजबली सिंह और विन्ध्याचल सिंह के नाम जुबान पर याद हैं।
इन लोगों ने बताया कि लाकडाउन फर्स्ट के दिन तो इन लोगों ने परदेश में यह सोचकर काट लिया कि लाकडाउन खत्म होते ही कामधाम शुरू होगा और जिन्दगी जल्द ही पटरी पर लौट आएगी। लेकिन लाकडाउन टू की घोषणा होते ही हिम्मत पस्त हो गई। अंततः हम अपने घरों के लिए निकल लिए और किसी तरह यहां तक पहुंचे।
इसी तरह भीमापार के पूर्व माध्यमिक विद्यालय में ठहरे नीरज गोंड ने बताया कि अभी एक दिन पूर्व ही वह यहां पहुंचा है। विद्यालय अपना है। यहां आने के बाद बचपन की पुरानी यादें ताजी हो गई। लेकिन अभी स्कूल का ताला बन्द है। बाहर ही समय गुजारना पड़ रहा है। दोपहर की भीषण गर्मी में यहां बाहर बरामदे में प्रवासियों को लू का भी सामना करना पड़ रहा है। जबकि मसूदपुर प्राथमिक विद्यालय में क्वारंटीन हुए दो सगे भाई सुरेश विश्वकर्मा मुंबई और राजकुमार विश्वकर्मा बंगलुरू से यहां आकर ठहरे हैं।
लॉकडाउन-2 के बाद जब वे घर को चले तो ट्रेन की टिकट के अलावा उनकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। क्वारंटीन कर रहे लोगों ने बताया कि इस दौरान लाकडाऊन और सोशल डिस्टेन्सिंग से जुड़े सरकारी निर्देशों का पालन भी वे बखूबी कर रहे हैं। अनौनी प्राथमिक विद्यालय में ठहरे बसन्त यादव ने बताया कि वे मुंबई में नौकरी कर रहे अपने बच्चों का हालचाल लेने गए थे। लेकिन लाकडाउन में वे भी वहां फंस गए। ट्रक में सवार होकरवह किसी तरह गांव पहुंचे। अब क्वारंटीन के रूप में वनवास काट रहे हैं।